Friday, November 1, 2019

धारा 370 क्या है और कैसे लागू हुआ

भारतीय संविधान की सबसे चर्चित और विवादास्पद धारा 370 को आख़िरकार नरेंद्र मोदी सरकार ने समाप्त कर दिया I भारतीय जनसंघ जिसे वर्तमान में भाजपा के नाम से जाना जाता है, का गठन ही इस विवादास्पद धारा को लागू करने के विरोध में हुआ था I जनसंघ के गठन के समय ही धारा 370 पार्टी के मुख्य एजेंडे में था पार्टी का नाम बदला, नेता बदले, नेतृत्व बदला, चुनाव चिन्ह बदला लेकिन यह धारा पार्टी के मुख्य एजेंडे में बना रहा और आख़िरकार 72 सालो के बाद इस धारा को समाप्त कर दिया गया I जम्मू और कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाली इस धारा के बारे में चर्चा करने से पहले सिलसिलेवार तरीके से इसके इतिहास को जान लेना आवश्यक है I 
25 जुलाई, 1947 - तब जबकि यह स्पष्ट हो गया था कि भारत को आज़ाद कर दिया जायेगा I यह भी निर्धारित कर लिया गया था कि भारत दो हिस्से में बंटेगा हिंदुस्तान और पाकिस्तान I लेकिन सबसे बड़ी समस्या उन छोटे- छोटे राज्यों की थी जो नवाबो और राजाओ के अधीन थे I उस समय तक़रीबन 552 ऐसी रियासतें थी जोकि नवाबो और राजाओ के अधीन थी I इस स्थिति में सबसे बड़ी चुनौती इन रियासतों को विलय के लिए तैयार करना था I इसी उद्देस्य से तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड मौन्टबेटन ने 25 जुलाई, 1947 को सभी रियासतों के प्रमुखों की एक मीटिंग बुलाई और इनसे हिंदुस्तान या पाकिस्तान में से किसी एक के साथ जाने के लिए कहा गया I ज्यादातर रियासतों के प्रमुखों ने मसौदे पर हस्ताक्षर कर दिया I लेकिन कुछ रियासतों के प्रमुखो ने अपने को दोनों देशो से अलग रखने का निर्णय लिया I जम्मू और कश्मीर भी उन्ही में से एक रियासत थी I
सितंबर, 1947 - जम्मू और कश्मीर के राजा हरि सिंह द्वारा जम्मू और कश्मीर को अलग रखने के निर्णय के बाद पाकिस्तान ने जम्मू और कश्मीर के ऊपर आक्रमण कर दिया , जिससे जम्मू और कश्मीर का पाकिस्तान में विलय कराया जा सके I जम्मू और कश्मीर का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में आ गया I
26 अक्टूबर, 1947 - पाकिस्तान द्वारा जम्मू और कश्मीर का बड़ा हिस्सा कब्जे में लेने के बाद वहां के राजा हरि सिंह ने भारत से मदद की गुहार लगाई और जम्मू और कश्मीर के भारत में बिना शर्त विलय का प्रस्ताव रखा I उसके बाद सरदार पटेल ने सेना भेजने का निर्णय लिया 
27 अक्टूबर, 1947 - 27 अक्टूबर, 1947 को तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन ने जम्मू और कश्मीर के विलय को मंज़ूरी दे दी I इस तरह से जम्मू और कश्मीर का भारत में विलय हुआ I
17 अक्टूबर, 1949 - जवाहर लाल नेहरू मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री और जम्मू और कश्मीर के राजा हरि सिंह के पूर्व दीवान गोपाल स्वामी आयंगर ने लोक सभा में बोलते हुए जम्मू और कश्मीर के लिए अस्थायी तौर पे कुछ विशेषाधिकार की मांग की I लोकसभा में बोलते हुए आयंगर ने कहा कि पाक अधिकृत कश्मीर से लगातार पलायन के कारण आंतरिक हालत ठीक नहीं है I इसलिए अभी भारतीय संविधान जम्मू और कश्मीर में लागू करना ठीक नहीं है,  जैसे ही हालत सामान्य हो जाये संविधान लागू कर दिया जाये I आयंगर के मांग पर नेहरू ने संविधान सभा की संस्तुति पर जम्मू और कश्मीर को विशेषाधिकार वाली धारा 370 संसद में पास करा दिया I संविधान सभा की संस्तुति पर लागू किया गया यह अंतिम धारा था I यह धारा कुछ समय के लिए अस्थायी तौर पे लागू किया गया था I धारा 370 के प्रावधानों के अनुसार -
1 .रक्षा, संचार और विदेश के अलावा जम्मू और कश्मीर के पास अपना कानून बनाए का अधिकार है I
2 .भारतीय संविधान की धारा 356 और धारा 360 जो आपातकाल लगाने से सम्बंधित है जम्मू और कश्मीर में लागू नहीं होगा I
3 .जम्मू और कश्मीर से बाहर का निवासी राज्य में ज़मीन नहीं खरीद सकता I
4 .राज्य विधानसभा द्वारा पारित किसी भी विधेयक को भारत के किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दिया जा सकता I
21 अक्टूबर, 1951 - पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लिकायत अली खान और भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के बीच दिल्ली समझौते और धारा 370 लागू करने के विरोध में नेहरू मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री श्यामा प्रसाद मुख़र्जी ने यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि 'एक राज्य में दो प्रधान, दो निशान और दो विधान नहीं चलेगा ' I डॉ. श्यामा प्रसाद मुख़र्जी ने धारा 370 हटाने और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर अलग राजनीतिक दल बनाया जो भारतीय जनसंघ के नाम से जाना गया I
11 मई, 1953 - जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुख़र्जी ने धारा 370 के विरोध में जम्मू और कश्मीर में बिना परमिट के प्रवेश करने का प्रयास किया I 11 मई , 1953 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुख़र्जी को गिरफ्तार कर लिया गया I उस समय जम्मू और कश्मीर में प्रवेश के लिए परमिट लेना पड़ता था I 
23 मई, 1953 - डॉ. श्यामा प्रसाद मुख़र्जी को गिरफ्तार कर श्रीनगर जेल में रखा गया I जहां 23 मई, 1953 को  संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी मौत हो गई, जोकि काफी विवादित रहा I  डॉ. श्यामा प्रसाद मुख़र्जी की मृत्यु के बाद जम्मू और कश्मीर में प्रवेश के लिए प्रवेश लेने वाला प्रावधान ख़तम कर दिया गया I
14 मई , 1954 - 14 मई, 1954 को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और जम्मू और कश्मीर के अंतरिम प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला के बीच हुए समझौते के अंतर्गत धारा 370 में एक और विवादित अनुक्षेद 35A जोड़ा गया और भारत के राष्ट्रपति द्वारा इसको लागू किया गया I 35A का काफी विरोध किया गया इस अनुक्षेद के अंतर्गत -
1 .जम्मू और कश्मीर को अपनी नागरिकता को पुनर्परिभाषित करने का अधिकार दिया गया I
2 .जम्मू और कश्मीर से बाहर का कोई भी व्यक्ति राज्य की नागरिकता नहीं ले सकता I
3 .जम्मू और कश्मीर से बाहर का कोई भी व्यक्ति राज्य में व्यापर स्थापित नहीं कर सकता I
4 . जम्मू और कश्मीर से बाहर के किसी भी व्यक्ति से शादी करने पर महिलाओ के नागरिकता सहित सभी अधिकार छीन लिए जायेंगे I
5 अगस्त , 2019 - जनसंघ की शुरुआत जिस धारा 370 के विरोध में की गई थी, वह पार्टी का मुख्य एजेंडा बना रहा I जनसंघ का नाम बदला, निशान बदला, नेतृत्व बदलता रहा लेकिन धारा 370 हटाने का मुद्दा ज़िंदा रहा I  धारा 370 लागू होने के 72 सालो बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली पूर्ण बहुमत वाली भाजपा सरकार ने आख़िरकार धारा 370 समाप्त कर दिया, जिसको संसद के दोनों सदनों में पास कर दिया गया और राष्ट्रपति द्वारा मंज़ूरी मिल गई I 
कांग्रेस के पूर्व सरकारों ने धारा 370 हटाने का प्रयास क्यों नहीं किया ?
 यह बिलकुल स्पष्ट था कि धारा 370 अस्थायी रूप से जोड़ा गया था और इसे सामान्य बहुमत से कभी भी भारत का राष्ट्रपति समाप्त कर सकता है I अब सवाल उठता है कि फिर 72 साल कैसे लग गए इसे हटाने में I इन 72 सालो में 60 साल कांग्रेस ने राज किया, तो निश्चित रूप से सबसे पहले यह प्रश्न कांग्रेस से ही पूछा जाना चाहिए I जवाब स्पष्ट सा है कांग्रेस ने कभी भी धारा 370 को हटाने का प्रयास नहीं किया I जिसके चार प्रमुख कारण थे -
1 .धारा 370 जवाहर लाल नेहरू द्वारा लाया गया था जिन्हे कांग्रेस अपना आदर्श मानती है I अब यदि कांग्रेस धारा 370 हटाने का प्रयास करती या इसका विरोध करती है, तो इसका सीधा मतलब नेहरू को गलत साबित करना है I 
2 .कांग्रेस को लगता था कि यदि धारा 370 का वह विरोध करती है या हटाने का प्रयास करती है तो जम्मू और कश्मीर से वह अपना जनाधार खो देगी I 
3 .कांग्रेस अच्छे से इस चीज़ से वाकिफ थी कि धारा 370 हटाने से घाटी में उपद्रव जैसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है जिससे से वह बचना चाहती थी I 
4. कांग्रेस को यह भी डर था कि अंतराष्ट्रीय विरादरी की तरफ से विरोध का सामना करना पड़ सकता है I 
जनता पार्टी सरकारों ने धारा 370 हटाने का प्रयास क्यों नहीं किया ?
 भारत में जनता पार्टी सरकारों ने भी कभी धारा 370 का विरोध नहीं किया और नही हटाने का प्रयास किया जिसका प्रमुख कारण रहे -
1.जनता पार्टी को लगता था कि ऐसा करने से उनके धर्मनिरपेक्ष छवि को नुकसान पहुँच सकता है I 
2. जनता पार्टी कभी भी इतनी मज़बूत स्थिति में नहीं रही कि कांग्रेस के समर्थन के बिना दोनों सदनों में यह बिल पास करा सके I  
वाजपेयी ने धारा 370 हटाने का प्रयास क्यों नहीं किया ? 
डॉ श्यामा प्रसाद मुख़र्जी और पंडित दींनदयाल उपाध्याय की मृत्यु के बाद धारा 370 के मुद्दे को जीवित रखने की जिम्मेदारी अटल बिहारी वाजपेयी की थी,  जिसको उन्होंने बखूबी निभाया I जब केंद्र में वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा की पहली बार सरकार बनी I तब उनके समर्थको की उम्मीदे बढ़ी कि वाजपेयी धारा 370 हटा सकते हैं I लेकिन ऐसा नहीं हुआ जिसके प्रमुख कारण रहे -
1. वाजपेयी चाहते हुए भी धारा 370 नहीं हटा सके क्योकि संसद के दोनों सदनों में बहुमत नहीं था I
2 .अगर किसी तरह से संसद में पास भी करा दिया तो राष्ट्रपति से मंज़ूरी नहीं मिलता I

Wednesday, July 17, 2019

एडोल्फ हिटलर के बारे में 25 अनसुने तथ्य


इतिहास में मानवता के सबसे बड़े दुश्मन की जब भी बात की जाती है, एडोल्फ हिटलर का नाम सबसे ऊपर आता है I जर्मनी के इस क्रूर शासक को दूसरे विश्व युद्ध के लिए प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार ठहराया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप भारी जानमाल का नुकसान हुआ I आंकड़ों के अनुसार दूसरे विश्व युद्ध के दौरान तक़रीबन 6 करोड़ लोगो ने अपनी जान गँवाई I हिटलर की ज़िन्दगी किसी पहेली से कम नहीं रही है I बात करते है, हिटलर की ज़िन्दगी से जुड़े कुछ प्रमुख तथ्यो की जो काफी कम लोग जानते है I
1. हिटलर यहूदियों से बहुत नफरत करता था , हिटलर के शासनकाल के दौरान यहूदियों पर जो जुल्म ढाये गए उसे सुनकर रूह काँप जाती है I उसके शासनकाल के दौरान तक़रीबन 60 लाख यहूदियों का कत्लेआम हुआ I

2. मानवतावाद का सबसे बड़ा दुश्मन हिटलर शुद्ध शाकाहारी और पशु प्रेमी था उसने पशुओ के संरक्षण के लिए सख्त कानून बनाया हुआ था I
3. क्रूरता की सभी सीमाएं लांघने वाला हिटलर बचपन में काफी शर्मीले और शांत स्वभाव का था I उसके शर्मीलेपन का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है, कि हिटलर जिस यहूदी लड़की से प्यार करता था उससे अपने प्यार का इज़हार कभी नहीं कर पाया I

 4. हिटलर एक शानदार वक्ता था और अपने भाषण खुद ही लिखता था और यही कारण है कि हिटलर जर्मनीवासियो का दिल जीतने में कामयाब रहा I
5. हिटलर शराब और सिगरेट से निषेध करता था I
6. हिटलर के माता-पिता चचेरे भाई बहन थे, हिटलर अपनी माता से जितना ज्यादा प्यार करता था और पिता से उतनी ही नफरत I


7. हिटलर आस्तिक था और बचपन में पादरी बनना चाहता था I
8. एक शांत और शर्मीले स्वभाव के बच्चे से लेकर क्रूर शासक बनने तक का सफर काफी उतर-चढाव भरा रहा I हिटलर के पिता काफी सख्त और क्रूर इंसान थे और इसका हिटलर की जिंदगी पर सबसे बड़ा प्रभाव पड़ा I
9. हिटलर भारतीयों से बहुत नफरत करता था लेकिन सुभाषचंद्र बोस और हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद से मिलने के बाद उसका नज़रिया बदल गया I

10. महान जर्मन वैज्ञानिक आइंस्टीन ने हिटलर की दमनकारी नीतियों के कारण जर्मनी छोड़, अमेरिका की नागरिकता ले लिया था I
11. आत्महत्या करने से एक दिन पहले हिटलर ने अपनी गर्लफ्रेंड इवा ब्राउन से शादी की थी, रूस द्वारा बर्लिन पर हमला करने के बाद हिटलर ने प्रेमिका सहित आत्महत्या कर लिया था I
12. हिटलर को 1939 में नोबेल के शांति पुरष्कार के लिए नामित किया गया था I
13. अमेरिका के 'टाइम' मैगज़ीन द्वारा 1938 में हिटलर को 'पर्सन ऑफ़ द ईयर ' बताया गया था I
14. हिटलर अपने पिता की तीसरी पत्नी का बेटा था I
15. 'एडोल्फ ' शब्द का मतलब खतरनाक भेड़िया होता है I
16. हिटलर ने जर्मन सेना की तरफ से पहला विश्व युद्ध लड़ा था, उस समय अमेरिकी सैनिको ने हिटलर को गिरफ्तार करने के बाद ज़िंदा छोड़ दिया था I
17. जर्मनी की 15 साल की एक यहूदी लड़की 'एनी फ़्रैंक ' ने एक डायरी लिखी थी I जिसमें हिटलर द्वारा यहूदियों के खिलाफ दमन का बड़े ही मार्मिक तरीके से वर्णन किया गया था I यह डायरी बाद में किताब के रूप में प्रकाशित हुई थी और जो बाद में बेस्ट सेलर बनी I
18. हिटलर को हमेशा अपनी मौत का डर रहता था I यहाँ तक कि वह खाना खाने से पहले उसे टेस्ट कराता था I
हिटलर मूलत ऑस्ट्रिया का निवासी था I
19. हिटलर की आत्मकथा 'मी केम्प ' 50 से ज्यादा भाषाओ में प्रकाशित हो चुकी है और दुनिया की सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबो में से एक है I
20. हिटलर दूसरे विश्व युद्ध में निर्णायक रूप से जितने की स्थिति में था I लेकिन उसके सहयोगी जापान के नागासाकी और हिरोशिमा पर अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिराने और रूस में मौसम ख़राब हो जाने की वजह से हिटलर युद्ध हार गया I
21. हिटलर द्वारा यहूदियों से नफरत का सबसे बड़ा कारण प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मन यहूदियों द्वारा जर्मनी का सहयोग करना नहीं था I हिटलर के अनुसार जर्मन यहूदि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मूकदर्शक बन जर्मनी की हार देखते रहे I
22. हिटलर और चार्ली चैपलिन में काफी समानताये थी जैसे कि दोनों की मूंछे एक सामान , दोनों के जन्म का साल एक ही था, यहाँ तक कि दोनों के जन्म में सिर्फ 4 दिन का अंतर था I
23. बचपन में कम बोलने वाला और शर्मीले स्वभाव का हिटलर को दुनिया के बेहतरीन वक्ताओं में से एक माना जाता है, उसमे भीड़ को आकर्षित करने की अदभुत क्षमता थी I
24. हिटलर के जर्मनी में उदय का सबसे बड़ा कारण प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी की शर्मनाक हार, जर्मनी में भ्रस्टाचार, राष्ट्रवाद का आभाव था I
25. हिटलर मानता था कि आर्य दुनिया में सबसे श्रेष्ठ है और उनका जन्म दुनिया पर शासन करने के लिए ही हुआ है I इसी मान्यता के चलते हिटलर ने आर्यन सभ्यता के प्रतीक स्वास्तिक को अपनी पार्टी और नाज़ी आंदोलन का प्रतीक चिन्ह बनाया I

Thursday, July 4, 2019

लाल कृष्ण आडवाणी- राजनीतिक सफ़र

भारतीय जनता पार्टी के लौह पुरुष कहे जाने वाले और भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से, एक लाल कृष्ण आडवाणी का नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं I भाजपा को 2 सदस्य से शिखर तक पहुँचाने में लाल कृष्ण आडवाणी  का बहुत बड़ी भूमिका रही I अटल बिहारी वाजपेयी के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर आडवाणी ने भाजपा को देश के कोने-कोने तक पहुँचाया I आइये नज़र डालते है लाल कृष्ण आडवाणी के 6 दशक से ज़्यादा के राजनीतिक सफर पर I
1927- 8, नवंबर, को कराची (पाकिस्तान) में एक हिन्दू सिंधी परिवार में जन्मे I
1951- श्यामा प्रसाद मुख़र्जी द्वारा गठित भारतीय जनसंघ के सदस्य बने I
1957- राजस्थान में जनसंघ के महासचिव एस. एस. भंडारी के सचिव बने I
1966 - जनसंघ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बने I
1970 - दिल्ली से राज्य सभा सदस्य चुने गए I
1973 - जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए I
1976 - गुजरात से राज्य सभा के सदस्य चुने गए I
1977 - जनता पार्टी के महासचिव चुने गए I
1977 - मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहले गैर कांग्रेसी सरकार में सुचना और प्रसारण मंत्री बने I
1980- जनता पार्टी से अलग होकर जनसंघ के पुराने सदस्यों ने भाजपा का गठन किया और आडवाणी भाजपा के संस्थापक सदस्य बने I
1980- भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव चुने गए I
1982 - मध्य प्रदेश से राज्य सभा  चुने गए I
1986 - मध्य प्रदेश से राज्य सभा  चुने गए I
1986 - भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए I
1989 - नई दिल्ली लोकसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज की I
1989 - लोकसभा में विपक्ष के नेता चुने गए I
1991 - गुजरात के सोमनाथ से देशव्यापी रथ यात्रा निकाली I भाजपा को जन-जन पहुंचाने का श्रेय इसी रथ यात्रा को दिया जाता है I
1991- लोकसभा में विपक्ष के नेता चुने गए I
1991 - नई दिल्ली सीट से लोकसभा का चुनाव जीता I
1993- भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए I
1996 - गाँधीनगर से लोकसभा के लिए चुने गए I
1996 - अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी सरकार में गृह मंत्री बने I
1998 - गाँधीनगर से लोकसभा के लिए चुने गए I
1998 - अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी सरकार में गृह मंत्री बने I
1999 - गाँधीनगर से लोकसभा के लिए चुने गए I
1999 - अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी सरकार में गृह मंत्री बने I
2002 - भारत के उप प्रधानमंत्री बने I
2004 - गाँधीनगर से लोकसभा के लिए चुने गए I
2004 - लोकसभा में विपक्ष के नेता चुने गए I
2009 - गाँधीनगर से लोकसभा के लिए चुने गए I
2014- भाजपा के मार्गदर्शक मंडल के सदस्य बने I
2014 - गाँधीनगर से लोकसभा के लिए चुने गए I
2018 - भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पदम् विभूषण ' से सम्मानित किये गए I


Friday, May 31, 2019

अटल बिहारी बाजपेयी- राजनीतिक सफ़रनामा

अटल बिहारी बाजपेयी एक दूरदर्शी राजनेता थे, जिन्हे भारतीय राजनीति में मूल्य आधारित राजनीति और ईमानदारी के लिए जाना जाता है I तीन बार भारत के प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी बाजपेयी की गिनती भारत के उन गिने- चुने राजनेताओ में किया जाता है, जिन्होंने अपनी निर्णय क्षमता और दूरदर्शिता से भारत को नई ऊचाइयों पर पहुँचाया I अपने 50 साल से ज्यादा के राजनीतिक करियर में अटलजी ने कई संवैधानिक और राजनीतिक पदों को ग्रहण किया I आइये नज़र डालते है उनकी राजनीतिक यात्रा पर I
  • 1924- मध्य प्रदेश के ग्वालियर में जन्म I
  • 1942- 18 वर्ष की उम्र में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े I
  • 1942- भारत छोडो आंदोलन में भाग लिया और जेल गए I
  •  1951- जनसंघ के संस्थापक सदस्य बने I
  • 1951- श्यामा प्रसाद मुख़र्जी द्वारा कांग्रेस के मज़बूत विकल्प के रूप में स्थापित राजनीतिक दल भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय सचिव बने I 
  • 1953- जनसंघ के टिकट पर लखनऊ से अपना पहला लोकसभा चुनाव हारे I
  • 1955- गैर-कश्मीरी भारतीयो के साथ भेदभाव और कश्मीर में धारा-370 हटाने की मांग को लेकर श्यामा प्रसाद मुख़र्जी के साथ भूख हड़ताल पर बैठे I
  • 1957- जनसंघ प्रत्याशी के रूप में लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ा लखनऊ और मथुरा से चुनाव हारे लेकिन बलरामपुर से चुनाव जीतकर पहली बार संसद पहुंचे I
  • 1962- जनसंघ प्रत्याशी के रूप में कांग्रेस प्रत्याशी सुभद्रा जोशी से बलरामपुर लोकसभा का चनाव हारे I
  • 1962- संसद के उच्च सदन राज्य सभा के लिए चुने गए I
  • 1967- कांग्रेस के सुभद्रा जोशी को हराकर बलरामपुर से लोकसभा सदस्य चुने गए I
  • 1968- दीनदयाल उपाध्याय के निधन के बाद भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए I
  • 1971- ग्वालियर से जनसंघ प्रत्याशी के रूप में लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद पहुंचे I
  • 1977- जनता पार्टी प्रत्याशी के रूप में नई दिल्ली लोकसभा सीट से चुने गए ( 1977 में जनसंघ समेत कई विपक्षी पार्टियों का जनता पार्टी में विलय कर दिया गया था ) I
  • 1977- केंद्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार में विदेश मंत्री बने I
  • 1980- जनता पार्टी प्रत्याशी के रूप में नई दिल्ली लोकसभा सीट से चुने गए ( 1977 में जनसंघ समेत कई विपक्षी पार्टियों का जनता पार्टी में विलय कर दिया गया था ) I
  • 1980- राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सदस्य बने रहने को लेकर जनता पार्टी से विवाद के बाद जनसंघ के पुराने सदस्यों ने जनता पार्टी से अलग होकर अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में नई राजनीतिक दल ,भारतीय जनता पार्टी ' का गठन किया अटल बिहारी बाजपेयी भाजपा के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष बने I  
  • 1984- ग्वालियर से भाजपा प्रत्याशी के रूप में कांग्रेस के माधव राव सिंधिया से लोकसभा का चुनाव हारे I
  • 1986- संसद के उच्च सदन राज्य सभा के लिए चुने गए I
  • 1991- लखनऊ से भाजपा प्रत्याशी के रूप में लोकसभा के लिए चुने गए I
  • 1992- भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पदम् विभूषण' से सम्मानित किये गए I
  • 1994- सर्वश्रेष्ठ सांसद से सम्मानित I 
  •  1996- लखनऊ से भाजपा प्रत्याशी के रूप में लोकसभा के लिए चुने गए I
  • 1996- पहली बार भारत के प्रधानमंत्री बने I
  • 1998- लखनऊ से भाजपा प्रत्याशी के रूप में लोकसभा के लिए चुने गए I
  • 1998- दूसरी बार भारत के प्रधानमंत्री बने I
  • 1999- लखनऊ से भाजपा प्रत्याशी के रूप में लोकसभा के लिए चुने गए I
  • 1999- तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री बने I
  • 2004- लखनऊ से भाजपा प्रत्याशी के रूप में लोकसभा के लिए चुने गए I
  • 2005- सक्रिय राजनीति से सन्यास लिया I
  • 2015- भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किये गए I
  • 2018- 16 अगस्त को नई दिल्ली में निधन I


Wednesday, April 10, 2019

ओशो की शिक्षायें

आचार्य रजनीश उर्फ़ ओशो एक महान  दार्शनिक,चिंतक और धार्मिक नेता थे, जिन्होंने अपने विचारो से पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया और रजनीश आंदोलन का नेतृत्व किया I रजनीश एक कुशल वक्ता थे जिन्होंने बड़े साहसिक तरीके से समाज, धर्म, सरकार, अर्थव्यव्स्था, युवा, शादी, सेक्स, परिवार पर अपने विचार रखे I ओशो के विचारो और शिक्षाओं को संकलित कर किताब के रूप में प्रकाशित किया गया, जिनकी संख्या तक़रीबन 500 से ज्यादा है I आइये नज़र डालते है ओशो के कुछ प्रमुख विचारों पर I

  1. धर्म पर ओशो के विचार- ओशो किसी भी धर्म को नहीं मानते थे I ओशो का कहना था कि सभी धर्मो की उत्पत्ति हज़ारो वर्ष पहले हुई थी और उस समय के लिए यह धार्मिक विचार ठीक थे I लेकिन आज के समय में यह धार्मिक विचार अप्रासंगिक हो चुके है I आज सभी धर्म चाहे वह ईसाई हो, हिन्दू हो, मुस्लिम हो, यहूदी हो, बौद्ध हो या अन्य कोई धर्म अपने मूल सिद्धांतो से भटक चुके है I आज यह मानव की आवश्यकताओं की झूठी तृप्ति में लगे है I आज इंसान को पादरी, पुजारी, मौलवी और भिक्षुओ की नहीं, बल्कि अपने अंतरात्मा की आवाज़ को सुनना चाहिए I यह धर्म तुम्हे स्वर्ग-नरक, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म की बाते सिखाते है, जबकि वास्तविक धर्म अपने मन की, अपने अंतरात्मा की बात सुनना है I हमें एक ऐसे धर्म की जरुरत है जो आडम्बरो और मान्यताओं से मुक्त हो, जो अखंडित मानव के कल्याण की बात करता हो I
  2. सरकार पर ओशो के विचार- ओशो के अनुसार राजनीति और राजनेता समस्त मानव जाति के सबसे बड़े दुश्मन है I मानवता सत्ता के भूखे इन अहंकारी राजनेताओ के पागलपन का शिकार है, जो सत्ता और अहंकार की पूर्ति के लिए मानवता का क़त्ल कर रहे है I मानव को किसी भी सरकार की जरुरत नहीं है, मानव अपने आप में इतना कुशल और सक्षम है कि वह अपना नियमन खुद कर सकता है I ओशो एक ऐसे राज्य की कल्पना करते है, जिसकी कोई भौगौलिक सीमा ना हो और जहाँ आने और जाने की कोई पाबन्दी ना हो, एक ऐसा राज्य जो नियमो, परम्पराओ और धार्मिक मान्यताओं से मुक्त हो I 
  3. साम्यवाद पर ओशो के विचार- ओशो साम्यवाद और उनकी सामाजिक समरसता के विचारधारा के विरूद्ध थे I ओशो कार्ल के मार्क्स के साम्यवाद के विचार को आधुनिक समाज के लिए खतरनाक मानते थे I कार्ल मार्क्स का विचार कि अमीरो को लूटना और उनके धन को गरीबो में बराबर बाँटना आज के समाज के लिए विघटनकारी साबित होगी I साम्यवाद नहीं बल्कि आज पूंजीवाद के जरिये विकास और सामाजिक न्याय को सुनिश्चित किया जा सकता है I धन ही वह माध्यम है जिससे तकनीकि विकास किया जा सकता है और अगर तकनीकि विकास होगी तो गरीबी अपने आप दूर हो जाएगी I क्योकि आर्थिक विकास और तकनीकि एक दूसरे के पूरक है I पूंजीवाद आधुनिक समाज और मानवता की जरुरत है I
  4. युवाओं पर ओशो के विचार- किसी भी समाज को आगे ले जाने की जिम्मेदारी युवाओ के कंधे पे होती है I इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि युवा युवा ही बना रहे I युवाओ को भूत के बारे में नही सोचना है और अगर वह ऐसा करता है तो निश्चित रूप से मानसिक रूप से बूढ़ा हो चूका है, अगर वह भविष्य की परिकल्पना करता है तो वह मानसिक रूप से बच्चा है I हमें ऐसे युवाओ की जरूरत है जो वर्तमान में जीते हो और अपने वर्तमान को बेहतर करने के लिए प्रयासरत है I ऐसे युवा जिनकी सोच भूत और भविष्य के इर्द-गिर्द घूमती है कभी भी अपना और समाज का बेहतर नहीं कर सकते I हमें ऐसे युवा चाहिए जो जिद्दी हो, जिनमे बदलाव लाने की जिद्द हो और जिनके क्रान्तिकारी विचार हो I याद रखना है कि हम इस दुनिया में किसी की अपेक्षा पूरा करने नहीं आये I हमेशा अपने मन की सुनो और स्वंतंत्र होकर जीवन जिए I
  5. स्वामी विवेकानंद पर ओशो के विचार-  ओशो के अनुसार बिना किसी संदेह के स्वामी विवेकानंद एक बेहतरीन वक्ता, दमदार व्यक्तित्व के धनी, तेज दिमाग से परिपूर्ण करिश्माई संत थे और उनकी ज़िन्दगी निश्चित रूप से प्रेरित करने वाली है I लेकिन उनका धन के प्रति निश्क्तता हैरान करने वाली है  और ऐसा इसलिए है क्योकि उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस से उन्हें इसी तरह की शिक्षा मिली I 
  6. मौत पर ओशो के विचार- मृत्यु एक ऐसा शब्द है जिसके बारे में लोगो की अवधारणा बिलकुल गलत है I मृत्यु को जीवन का अंत मानना ही सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी है मृत्यु अंत नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की शुरुआत है I मृत्यु दो जिंदगियों  बीच का दरवाजा है, मृत्यु एक अनुभव है मृत्यु एक उत्सव है I यह मातम नहीं जश्न का विषय है, मृत्यु खूबसूरत प्रेयसी की तरह है, लेकिन अज्ञानतावश हम इसे बदसूरत मान लेते है I
  7. प्रेम पर ओशो के विचार- अक्सर ऐसा सुनने को मिल जाता है मैं स्वयं से ज्यादा तुमसे प्यार करता हु ऐसा संभव नहीं और ऐसा अगर कोई कहता है तो निश्चित रूप से वह प्रेम नहीं I दुसरो से प्रेम करने से पहले आप का स्वयं से प्रेम करना बहुत आवश्यक है I अगर आप स्वयं से प्रेम नहीं करते तो किसी से प्रेम नहीं कर सकते I स्वयं से प्रेम करने के लिए अपने को जानना बहुत आवश्यक है जिसके लिए आपको ध्यान करना पड़ेगा I अर्थात प्राथमिक चीज़ है ध्यान, फिर स्वयं से प्रेम करना और फिर किसी और से प्यार करना I
  8. सेक्स पर ओशो के विचार- सेक्स एक ऐसा विषय है जिस पर भारतीय चिंतक और दार्शनिक चुप रहे I लेकिन ओशो ने सेक्स को लेकर खुलकर अपना मत प्रकट किया I ओशो की बेस्ट सेलर किताब 'सम्भोग से समाधी तक़' इसी विषय से सम्बंधित है I ओशो के अनुसार सेक्स को समाज में गलत माना जाता है I जबकि सच यह है कि सेक्स में असीमित ऊर्जा है, इतनी ऊर्जा की जो इंसान की ज़िन्दगी परिवर्तित कर सकती है I इसलिए सेक्स की भावना को दबाना कहीं से भी न्यायोचित नहीं I सेक्स समाधि और संत की मंज़िल तक पहुंचने का सबसे सुगम रास्ता है I ओशो की इस किताब का काफी विरोध किया गया और इसके विरोध में भी कई किताबे प्रकाशित की गई I  Watch youthisthan videos on youtube

Sunday, April 7, 2019

आचार्य रजनीश उर्फ़ ओशो

आप उनके विचारो से सहमत हो सकते है या असहमत लेकिन उनके लोकप्रियता और क्षमता को नहीं नकार सकते , जी हां हम बात कर रहे है चंद्रमोहन जैन उर्फ़ आचार्य रजनीश उर्फ़ ओशो की एक दार्शनिक और चिंतक जिन्हे उनके चाहनेवाले भगवान ओशो भी बुलाते है I ओशो को एक विद्रोही चिंतक भी कहा जाता है जिनका विवादों से गहरा नाता रहा I ओशो जब भी कुछ बोलते विवाद उठना लाजमी था, क्योकि ओशो की बाते सरकार, समाज और धर्म के खिलाफ होती थी I ओशो कितने विद्रोही थे इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है, कि 21 देशो ने ओशो के प्रवेश को प्रतिबंधित कर रखा था I लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ओशो ने पूरी दुनिया से चाहनेवाले को आकर्षित किया I
जन्म- ओशो का जन्म 11 दिसंबर, 1931 को मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के कुछवाडा में एक गरीब जैन परिवार में हुआ था I ओशो के पिता का नाम बाबूलाल जैन और माता का नाम सरस्वती जैन था I ओशो का बचपन अपने नाना-नानी के घर बीता, लेकिन ओशो जब 7 वर्ष के थे तो उनके नाना की मृत्यु हो गई I नाना की मृत्यु का ओशो के ऊपर काफी बड़ा प्रभाव पड़ा और इसके बाद ओशो अपने घर माता-पिता के पास आ गए I ओशो बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थ, जिसके अंदर सत्य को जानने की लालसा थी, लेकिन इसके साथ-साथ ओशो विद्रोही स्वभाव के भी थे I
शिक्षा- प्रारंभिक शिक्षा अपने ननिहाल और गांव से पूरा करने के बाद रजनीश उच्च शिक्षा के लिए जबलपुर चले गए I जबलपुर के हितकारिणी कॉलेज, डी. एन. कॉलेज और सागर विश्विद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातक और परास्नातक की डिग्री ली I छात्र जीवन के दौरान दो राष्ट्रवादी संगठनो आज़ाद हिन्द फौज (Indian National Army) और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (Rastriya Swain Sewak Sangh) से जुड़े रहे I
ओशो एक वक्ता के रूप में- उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद ओशो ने जबलपुर के एक कॉलेज में दर्शनशास्त्र के प्रवक्ता के रूप में पढ़ाना शुरू किया I ओशो एक अच्छे वक्ता थे और इस कारण काफी कम समय में छात्रों के बीच लोकप्रिय हो गए I लेकिन उनकी शिक्षाए धर्म, सरकार , समाज के खिलाफ होने के कारण विवाद हो गया, जिसकी वजह से ओशो को कॉलेज से निकाल दिया गया I फिर ओशो ने जबलपुर विश्वविद्यालय में पढ़ाना शुरू किया, लेकिन वहां भी अपने विद्रोही व्याख्यानों के कारण ओशो को नौकरी से हटा दिया गया I यह 1955 के आसपास का दौर था और उस समय तक ओशो छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय हो चुके थे I अब ओशो ने पुरे भारत में घूमकर-घूमकर व्याख्यान देना शुरू किया और अपने को आचार्य रजनीश कहने लगे I रजनीश अब पुरे भारत में लोकप्रिय हो चुके थे लेकिन लोकप्रियता के साथ-साथ रजनीश के खिलाफ विद्रोह भी बढ़ता गया I रजनीश खुलकर गाँधी, सरकार, वामपंथ, धर्म और सामाजिक रूढ़िताओ के खिलाफ बोल रहे थे, जिसके कारण आचार्य रजनीश के खिलाफ कार्यवाही करने की मांग उठने लगी I
ओशो सेक्स गुरु के रूप में - सेक्स एक ऐसा विषय है जिसके बारे में भारतीय दार्शनिक चुप रहते है I लेकिन ओशो ने सेक्स के बारे में न सिर्फ बोला बल्कि सेक्स को महत्वपूर्ण बताया I रजनीश के अनुसार सेक्स प्रेम का सार है और समाधि की अवस्था में जाने की प्राथमिक सीढ़ी I 1960 के दशक में रजनीश के सेक्स से सम्बंधित विचारो को संकलित कर किताब के रूप में प्रकाशित किया गया I जिसका नाम 'सम्भोग से समाधि तक़ (Sex to superconsciousness)'  रखा गया I यह किताब इंटरनेशनल बेस्ट सेलर थी जिसका 60 से ज्यादा भाषाओ में अनुवाद किया गया I इस किताब के प्रकाशन के बाद रजनीश को 'सेक्स गुरु' कहा गया I इस किताब के बाद एक तरफ जहा भारत सहित पश्चिमी देशो में रजनीश के चाहंने वालो की संख्या तेजी से बढ़ने लगी वही दूसरी तरफ रजनीश के खिलाफ विद्रोह भी बढ़ता गया I
ओशो मैडिटेशन रिसोर्ट- 1970 के दशक तक रजनीश भारत सहित पश्चिमी देशो में लोकप्रिय हो चुके थे I यही वह दौर था जब रजनीश ने पुणे में काफी बड़े एरिया में ओशो मैडिटेशन रिसोर्ट की स्थापना की और अपने को भगवान ओशो कहने लगे I यह मैडिटेशन रिसोर्ट ओशो के अनुवाईयो का मुख्य केंद्र बन गया I देश-विदेश से लाखो लोग इस मैडिटेशन रिसोर्ट में आने लगे, जिनमे ज्यादातर पश्चिमी देशो के युवक-युवतिया थी I इस रिसोर्ट में लोगो को हर काम की पूरी आज़ादी थी, कोई भी रोक -टोक नहीं था I ओशो के आलोचक इसे सेक्स मंडी भी कहने लगे I
ओशो का पश्चिम भ्रमण- 1981 में ओशो बीमार पड़ गए और उनके चाहने वालो ने अमेरिका जाकर इलाज करने की जिद्द की I ओशो 1981 में अमेरिका इलाज कराने गए और कुछ ही दिनों में ओशो स्वस्थ हो गए I उस समय अमेरिका में ओशो के चाहने वालो की तादाद लाखो में थी, जिनमे ज्यादातर अमीर थे I अमेरिका में उनके चाहने वालो ने ओशो से वही बसने की अपील की I इसके लिए बाकायदा अमेरिका के ओरेगाओ में 70 एकड़ भूमि खरीदी गई और रजनीशपुरम नाम का शहर बसाया गया I धीरे-धीरे यहाँ लाखो की तादाद में घर बन गए और यह सभी ओशो के अनुयायी थे I सिर्फ चार सालो में रजनीशपुरम को एक अच्छे शहर की तरह सुसज्जित कर दिया गया I यहाँ रजनीश एयरपोर्ट बनाया गया, ओशो के द्वारा कानून बनाये गए, और सामानांतर सरकार का गठन किया गया I अब यह अमेरिका सरकार के लिए सीधी चुनौती थी I ओशो के सरकार और धर्म के खिलाफ शिक्षाओं के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और करीब 6 महीने बाद इस शर्त पे रिहा किया गया कि ओशो अमेरिका हमेशा के लिए छोड़ देंगे I 1985 में ओशो ने अमेरिका छोड़ दिया और अन्य पश्चिमी देशो का रुख किया I लेकिन चर्च के दबाव में सभी पश्चिमी देशो ने ओशो का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया I अमेरिका के पडोसी देश उरुग्वे ने कुछ दिन तक ओशो को शरण दिया, लेकिन अमेरिका के दबाव में उसने भी ओशो पे प्रतिबन्ध लगा दिया I अब ओशो के पास भारत वापिस आने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था I ओशो भारत वापिस आकर ओशो मैडिटेशन रिसोर्ट में उपदेश देने लगे I
 मृत्यु- 19 जनवरी, 1990 को पुणे के ओशो मैडिटेशन रिसोर्ट में ओशो का निधन हो गया I ओशो का निधन भी बड़े रहस्यमय परिस्थितियो में हुआ I कुछ लोग कहते है की ओशो ने खुद देह त्याग किया,  कुछ लोगो का मानना है कि ओशो को अमेरिका में कैद के दौरान 'हीलियम' नाम का ज़हर (slow poison) दिया गया, जबकि ओशो के परिवार के सदस्यों ने कुछ लोगो पर प्रॉपर्टी के लिए हत्या करने का आरोप लगाया I क्योकि ओशो के पास देश-विदेश में अरबो की प्रॉपर्टी थी I लेकिन जो भी कारण रहा हो ओशो के चाहने वाले ओशो के मृत्यु को ही नकारते है, उनका मानना है कि ओशो भगवान थे और ओशो ने न तो कभी जन्म लिया और नहीं मरे ओशो तो सिर्फ कुछ सालो के लिए इस धरती पर आये थे I
ओशो के बारे में अनसुने तथ्य- 
  1. ओशो शब्द लैटिन भाषा के 'ओशनिक' से लिया गया है जिसका मतलब है सागर में विलीन हो जाना I
  2. ओशो के द्वारा दिए गए उपदेशो को किताबो में संकलित कर प्रकाशित किया गया और ऐसे किताबो की संख्या 500 से ज्यादा है, जिनका सभी प्रमुख भाषाओ में अनुवाद किया गया है I
  3. ओशो की किताबो से आज भी अरबो रूपये की रॉयल्टी आती है I
  4. ओशो द्वारा लिखित 'सम्भोग से समाधि तक़ (Sex to superconsciousness)' इंटरनेशनल बेस्ट सेलर है, यह किताब 60 से ज्यादा भाषाओ में उपलब्ध है I
  5. ओशो द्वारा स्थापित ओशो मैडिटेशन रिसोर्ट, पुणे विदेशियों का प्रमुख आकर्षण केंद्र है I
  6. ओशो ने धर्मरहित और सामाजिक मान्यताओं से मुक्त समाज की बात कही , जिसमे प्रत्येक व्यक्ति के पास अपने तरीके से ज़िन्दगी जीने की आज़ादी हो I
  7. ओशो ने एक वैश्विक राज्य की बात की I
  8. ओशो दुनिया के इतिहास में शायद पहले ऐसे दार्शनिक थे, जिनके प्रवेश को 21 देशो(अमेरिका, स्वीडन, इंग्लैंड, रूस, जर्मनी, फ्रांस, ग्रीस, उरुग्वे, कनाडा सहित ) ने प्रतिबंधित कर रखा था I  
  9. ओशो अपने को भगवान मानते थे I उनके अनुसार 23 वर्ष की उम्र में जबलपुर में एक पार्क में एक पेड़ के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था I
  10. फ़िल्मी दुनिया के कई सितारें और राजनेता ओशो के अनुयायी थे, जिनमे प्रमुख विनोद खन्ना, महेश भट्ट और परवीन बॉबी शामिल है I विनोद खन्ना ने तो अपने स्टारडम को छोड़ कर अमेरिका के रजनीशपुरम जाकर ओशो के आश्रम में पांच साल बिताये I
  11. ओशो मौत को एक उत्सव मानते थे और यही कारण है कि उनके पुणे स्थित पुणे योग केंद्र में किसी की भी मौत पर मातम की जगह ऊत्सव मनाया जाता था I ओशो के मौत पर भी उनकी इच्छानुसार जश्न मनाया गया I



Saturday, April 6, 2019

सुख क्या है ?

सुख क्या है ? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब मैं बचपन से ढूंढ रहा I लेकिन अब तक इसका सही जवाब नहीं मिला I इस प्रश्न के जवाब की उत्सुकता इसलिए भी हुई, क्योकि मैं बचपन से देख रहा हर इंसान सिर्फ ख़ुशी की ही कामना करता है I लेकिन अब तक कोई ऐसा इंसान नहीं मिला, जो पूरी तरह से प्रसन्न हो और जिसके जीवन में दुःख न हो I अपने स्कूल के दिनों में मैंने एक कहानी पढ़ी थी, जिसके बाद काफी हद तक मुझे समझ में आ गया, ख़ुशी क्या है ?
                        यह कहानी एक बड़े राज्य के राजा की थी जो मदिरा और सुंदरियों में खोया  रहता था, राजा स्वस्थ  सुंदर था, खाने - पीने और अन्य सुख सुविधा की कोई कमी ना थी I कहने की बात यह है कि उस राजा के पास वह सब कुछ था जो एक विलासी जीवन जीने के लिए चाहिए होता है I एक दिन की बात है राजा को अचानक से लगा कि लोग अक्सर बीमार पड़ते रहते है, लेकिन वह आज तक कभी बीमार नहीं पड़ा I इसका मतलब मुझे गंभीर बीमारी है,  जिसकी वज़ह से मैं बीमार नहीं पड़ता I अब राजा के दिमाग में यह बात बैठ गई कि उसे कोई बीमारी ना होना, इस बात का संकेत है कि वह गंभीर बीमारी से पीड़ित है I इस बात को लेके राजा उदास और दुखी रहने लगा I राजा ने अपने सेनापति को बुलाया और आदेश दिया कि राजा के इलाज के लिए इस राज्य के सबसे अच्छे डॉक्टरो को बुलाया जाये I जो भी डॉक्टर राजा का इलाज कर देगा उसे काफी बड़ा इनाम दिया जायेगा, लेकिन अगर कोई डॉक्टर बीमारी की पहचान कर इलाज नहीं कर पाया तो उसका सिर कलम कर दिया जायेगा I राजा के आदेशानुसार राज्य के अच्छे डॉक्टरों को एक-एक कर बुलाया गया और सबका कहना था कि राजा पूरी तरह से स्वस्थ है और उसे कोई बीमारी नहीं है I लेकिन राजा तो बीमारी के बारे में सुनना चाहता था और इसलिए उसने डॉक्टरों का सिर कलम करने का आदेश दिया I इस तरीके से एक-एक कर राज्य के सभी डॉक्टरों को बुलाया गया और सबका सिर कलम कर दिया गया I क्योकि सबका एक ही जवाब था राजा बीमार नहीं है I
                             अंत में पुरे राज्य में सिर्फ दो युवा डॉक्टर रह गए, जिन्होंने अभी- अभी कॉलेज की पढाई ख़तम की थी I दोनों ही कॉलेज में साथ- साथ पढ़े थे और हॉस्टल में भी साथ ही रहते थे I दोनों ही डॉक्टर पढ़ने में काफी अव्वल थे, लेकिन दोनों वैचारिक रूप से एक दूसरे से भिन्न थे I पहला डॉक्टर जो काफी मोटा था किताबी ज्ञान को व्याव्हारिक ज्ञान से ज्यादा प्राथमिकता देता था, उसका मानना था एक अच्छा डॉक्टर बनने के लिए किताबी ज्ञान का होना जरुरी है नाकि व्याव्हारिक ज्ञान का I जबकि दूसरा डॉक्टर जो काफी दुबला-पतला था हमेशा व्यावहारिक ज्ञान को प्राथमिकता देता था I राजा के इलाज के लिए इन दोनों डॉक्टरों को बुलाया गया I सबसे पहले मोटे डॉक्टर जो किताबी ज्ञान में विश्वास रखता था, को बुलाया गया I डॉक्टर ने राजा का चेक-अप किया, किताबी ज्ञान के हिसाब से राजा को कोई बीमारी नहीं थी I इसलिए डॉक्टर ने बोला राजा बीमार नहीं है, यह सुनते ही राजा आग बबूला हो गया और उसके आदेश पर डॉक्टर का सिर कलम कर दिया गया I अब दूसरे डॉक्टर को बुलाया गया दूसरे डॉक्टर को समझ में आ गया कि राजा बेवकूफ और मानसिक रूप से बीमार है, सच बोलना मतलब अपना सिर कलम कराना है I डॉक्टर ने राजा का चेक-अप किया और बोला राजा गंभीर रूप से बीमार है I राजा यह सुन काफी खुश हुआ क्योकि वह यही सुनना चाहता था राजा ने डॉक्टर को काफी सोने- चांदी दिए I
                           अब राजा ने बीमारी के इलाज के लिए पूछा , डॉक्टर ने कहा कि इलाज काफी आसान है बस एक दिन के लिए किसी सुखी इंसान का कमीज़ आप पहन ले बीमारी बिलकुल ठीक हो जाएगी I राजा ने अपने सैनिको को किसी सुखी इंसान का कमीज़ एक दिन के लिए लाने का आदेश दिया I सैनिको को भी लगा यह तो बड़ा आसान काम है, अब सैनिक निकल पड़े राज्य के भ्रमण के लिए ताकि कोई सुखी इंसान मिल जाये I सबसे पहले सैनिक सेठ- साहूकारों के पास पहुंचे और उनसे पूछा कि आप सुखी है लेकिन सबने कहा कि वह सुखी नहीं है I इस तरह सैनिको ने पूरा राज्य भ्रमण कर लिया लेकिन कोई सुखी इंसान नहीं मिला I अन्तत सैनिक निराश होकर वापिस लौट रहे थे, तभी उनकी नज़र एक बूढ़े किसान पर पड़ी जो जून की तेज दोपहर में खेत में हल चला रहा था  I एक सैनिक ने कहा कि इस पुरे राज्य में यह किसान ही एकमात्र बच गया है जिससे हमने पूछा नहीं I लेकिन बाकि सैनिको ने कहा कि इस राज्य के सेठ-साहूकार सुखी नहीं है तो यह बूढ़ा किसान कैसे सुखी हो सकता है I फिर भी सैनिको ने सोचा पूछने में क्या जाता है सैनिक किसान के पास गए और पूछा क्या तुम सुखी हो I किसान ने हँसते हुए जवाब दिया हां मैं बिलकुल सुखी ह,  मैं एक-एक कर अपने परिवार के सभी सदस्यों को भूख और बीमारी से खो चूका हु, इसलिए अब मेरे पास दुखी होने का कोई कारण नहीं है I सैनिको के ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा, सैनिको ने बूढ़े किसान से कहा तुम अपना कमीज़ एक दिन के लिए दे दो राजा के इलाज के लिए I इसके बदले तुम्हे ढेर सारा धन मिलेगा, किसान ने कहा कि मुझे अब धन-दौलत की जरुरत नहीं, लेकिन हां मैं राजा के लिए अपना कमीज़ दे देता, अगर मेरे पास होता I सैनिको ने वापिस आकर राजा को यह बात बताई I राजा को सारा मामला समझ में आ गया और अपनी बीमारी का इलाज भी मिल गया राजा ने डॉक्टर को काफी धन-दौलत के साथ विदा किया I
कहानी की सीख -
  1. सुखी होने के लिए धन-धान्य और भौतिक साधनो की जरुरत नहीं होती I
  2. सुख अपने अंदर ही निहित है इसे पाने के लिए कही और जाने की जरुरत नहीं I
  3. कॉलेज की परीक्षा को किताबी ज्ञान से पास किया जा सकता है, लेकिन ज़िन्दगी की परीक्षा के लिए व्यवहारिक ज्ञान की जरुरत होती है I
  4. मुर्ख और रूढ़िवादी इंसान वही सुनना चाहता है जिसकी धारणा उसने पहले से बना रखी है I ऐसे इंसान के सामने ज्ञान का प्रदर्शन और तर्क-वितर्क करना बेवकूफी है I

                           

Wednesday, April 3, 2019

लाल बहादुर शास्त्री - भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष

लाल  बहादुर शास्त्री एक ऐसा नाम जिसे सुनकर हर एक भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है I एक ऐसा राजनेता जिसने ईमानदारी, सादगी, त्याग और बहादुरी की ऐसी मिसाल पेश की जिसका कोई जवाब नहीं I एक  गरीब परिवार से प्रधानमंत्री बनने तक का सफर इतना आसान नहीं था, लेकिन संघर्ष करते हुए उस मुकाम तक पहुंचे I भारतीय राजनीति में ऐसा नेता ना तो कभी हुआ और नहीं होगा I
जन्म- भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को दीनदयाल उपाध्याय नगर , उत्तर प्रदेश में एक कायस्थ परिवार में हुआ था I लाल बहादुर शास्त्री का वास्तविक नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था, लेकिन काशी विद्यापीठ से शास्त्री की डिग्री लेने के बाद उनका नाम लाल बहादुर शास्त्री पड़ गया I लाल बहादुर शास्त्री के पिता का नाम शारदा प्रसाद श्रीवास्तव और माता का नाम रामदुलारी देवी था I लाल बहादुर शास्त्री के पिता स्कूल अध्यापक थे और माता गृहणी थी I दो भाई- बहनो में शास्त्री जी दूसरे नंबर के थे I जब लाल बहादुर शास्त्री सिर्फ एक साल के थे, उनके पिता की मृत्यु हो गई I शास्त्री जी का बचपन उनके नाना के घर बीता I शास्त्री जी का बचपन काफी अभावो और संघर्षो में बीता, और यही कारण है लाल बहादुर शास्त्री वक़्त के साथ मज़बूत होते गए I शास्त्री जी की प्रारंभिक शिक्षा दीनदयाल उपाध्याय नगर से ही हुई और उच्च शिक्षा काशी विद्यापीठ, वाराणसी से हुई I काशी विद्यापीठ, वाराणसी से लाल बहादुर शास्त्री ने 'शास्त्री' की उपाधि ली I लाल बहादुर शास्त्री पढाई करने के लिए प्रतिदिन गंगा नदी पार कर स्कूल जाया करते थे I लाल बहादुर शास्त्री का विवाह ललिता श्रीवास्तव से हुई थी
स्वाधीनता संग्राम में योगदान - लाल बहादुर शास्त्री महान दार्शनिक और चिंतक स्वामी विवेकानंद और महान चिंतक मदन मोहन मालवीय के विचारो से काफी प्रभावित थे I 1928 में शास्त्री जी कांग्रेस के सक्रिय सदस्य बने और  अलग- अलग पदों पर कांग्रेस में बने रहे I लाल बहादुर शास्त्री ने सत्याग्रह आंदोलन, भारत छोडो आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और स्वंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया I स्वंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण अंग्रेजी सरकार ने उन्हें जेल में डाल दिया और कुल मिलकर लाल बहादुर शास्त्री तक़रीबन 10 साल जेल में रहे I जेल में रहने के दौरान लाल बहादुर शास्त्री ने रुसी क्रांति, फ्रांस की क्रांति, और यूरोप की क्रांति के बारे में  पढ़ा और आत्मसात किया I
राजनीतिक करियर- 15 अगस्त, 1947 को आज़ादी के बाद उत्तर प्रदेश राज्य में गोविन्द वल्लभ पंत के नेतृत्व में बनी सरकार में लाल बहादुर शास्त्री सड़क और परिवहन मंत्री बने I इसके अलावा राज्य के पुलिस मंत्री (गृह मंत्री) के रूप में भी अपनी सेवाएं दी I 1952 में लाल बहादुर शास्त्री को भारत का रेल मंत्री बनाया गया और वह 1956 तक इस पद पर बने रहे I 1964 में जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद शास्त्री जी भारत के प्रधानमंत्री बने और मृत्युपर्यन्त इस पद पर बने रहे I
भारत-पाकिस्तान युद्ध- अगस्त 1965 को पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख अयूब खान के नेतृत्व में पाकिस्तानी सेना ने भारत पे आक्रमण कर दिया लेकिन शास्त्री जी ने आक्रमण का मुंहतोड़ जवाब दिया आक्रमण के कुछ ही दिनों के अंदर भारतीय सेना ने पाकिस्तान के लाहौर तक कब्ज़ा कर लिया अब पाकिस्तान को समझ में आ गया कि अगर यह युद्ध रुका नहीं तो कुछ ही दिनों में भारतीय सेना कराची और इस्लामाबाद भी कब्ज़ा कर लेगी अयूब खान ने अमेरिका से युद्ध रुकवाने की अपील की अमेरिका ने लाल बहादुर शास्त्री से युद्ध रोकने की अपील की लेकिन शास्त्री जी ने सिरे से ख़ारिज कर दिया इसके बाद फिर अमेरिका ने शास्त्री जी को धमकी दी कि अगर युद्ध नहीं रुका तो भारत को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे लेकिन मज़बूत व्यक्तित्व के नेता शास्त्री जी ने अमेरिका की धमकी को अनसुना कर दिया लेकिन कुछ भारतीय नेताओ के धरना- प्रदर्शन कारण शास्त्री जी ने युद्ध रोकने का निर्णय लिया
मृत्यु- 10 जनवरी, 1966 को ताशकंद में रूस की मध्यस्थता से लाल बहादुर शास्त्री और अयूब खान के बीच समझौता हुआ और भारत ने पाकिस्तान का जीता हुआ क्षेत्र वापिस कर दिया I समझौता के बाद अचानक लाल बहादुर शास्त्री की तबियत बिगड़ने लगी और उनकी मृत्यु हो गई I भारत सरकार ने मृत्यु का कारण हृदय गति का रुकना बताया जबकि बाद में पता चला कि उन्हें ज़हर दिया गया है I यहाँ तक कि भारत सरकार ने उनकी लाश का पोस्ट मोर्टेम भी नहीं कराया और नहीं कोई जाँच कराइ गई I शास्त्री जी को किस षड़यंत्र के तहत ज़हर दिया गया यह आज भी रहस्य बरक़रार है I
लाल बहादुर शास्त्री के बारे में अनसुने तथ्य-

  1. लाल बहादुर शास्त्री को 1966 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया I
  2. भारत से युद्ध में बुरी तरह पराजय के बाद पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह अयूब खान ने  साक्षात्कार के दौरान बताया कि मुझे शास्त्री जी के सादगी से लगा कि वह एक कमजोर नेता है और यही गलती पाकिस्तान की सबसे बड़ी भूल थी I शास्त्री जी ने जिस तरह से भारतीय सेना का नेतृत्व किया अकल्पनीय था I
  3. उत्तर प्रदेश के सड़क और परिवहन मंत्री रहते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने महिलाओ के बस कंडक्टर बनने का रास्ता साफ किया I
  4. उत्तर प्रदेश के पुलिस मंत्री रहते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने सबसे पहले लाठी चार्ज की जगह वाटर फाॅर्स प्रयोग करने की शुरुआत की I
  5. लाल बहादुर शास्त्री के लिए लोगो की निष्ठां का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अन्न की कमी होने पर शास्त्री जी ने सप्ताह में एक दिन व्रत रखने का आह्वान किया I जिसे पुरे भारत ने स्वीकार किया जिसे 'शास्त्री व्रत ' के नाम से जाना है I
  6. युद्ध के दौरान अमेरिका ने गेंहू का आयात रोक दिया और शास्त्री जी ने सप्ताह में एक दिन व्रत रखने का आह्वान किया और खर्चो की कटौती करने का आह्वान किया खुद शास्त्री जी ने अपने सारे खर्चो में कटौती की I
  7. लाल बहादुर शास्त्री ने एक रेल दुर्घटना के बाद पूरी जिम्मेदारी लेते हुए रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था I ऐसा उदहारण भारतीय राजनीति में कम ही देखने को मिलती है I
  8. लाल बहादुर शास्त्री आज़ादी के आंदोलन के दौरान जब जेल में थे तब उनकी बेटी बीमार हो गई थी I लेकिन अँगरेज़ सरकार ने पैरोल पर रिहा करने के लिए कुछ शर्त रखी जो शास्त्री जी को मंज़ूर नहीं थी और अन्तत लाल बहादुर शास्त्री की बेटी का देहांत हो गया I 
  9. लाल बहादुर शास्त्री जब प्रधानमंत्री थे तो उनके पास सिर्फ दो जोड़ी कपड़े थे I
  10. लाल बहादुर शास्त्री ने कोई भी सरकारी सुविधा नहीं ले रखी थी, वह अपना सारा काम खुद ही करते थे I 
  11. लाल बहादुर शास्त्री ने भारतीय राजनीति में सादगी, ईमानदारी और साहस की जो मिसाल पेश की शायद ही ऐसा कोई दूसरा उदहारण मिले I
  12. भारत- पाक युद्ध के समय शास्त्री जी ने 'जय जवान जय किसान' का नारा दिया इस नारे ने भारतीय जवानो के लिए संजीवनी का काम किया I

Thursday, March 28, 2019

जयप्रकाश नारायण- भारतीय राजनीति के किंग मेकर

भारतीय राजनीति में  कुछ नेता ऐसे हुए जिन्होंने सत्ता के शिखर को छुआ और कुछ ऐसे जिन्होंने उन्हें सत्ता के शिखर तक पहुंचाया I जयप्रकाश नारायण का भी नाम उन नेताओ में आता है, जिन्होंने किंग मेकर बनकर मोरार जी देसाई के नेतृत्व 1977 में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई I जयप्रकाश नारायण को भारतीय राजनीति में त्याग और समर्पण के लिए याद किया जाता है I जयप्रकाश नारायण का नाम लेते ही एक ऐसे मज़बूत व्यक्तित्व का चेहरा उभर के सामने आता है, जिसने अपनी जिद्द से कांग्रेस के अभेद माने जाने वाले सिंहासन को जड़ से हिला दिया और सत्ता से कांग्रेस को उखाड़ फेंका I
जन्म- जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर, 1902 बिहार के सारण जिले में ( अब यह जगह उत्तर प्रदेश के बलिया जिले का हिस्सा ) में एक कायस्थ परिवार में हुआ था I जयप्रकाश के पिता हरसू दयाल सरकारी मुलाज़िम और माता फूल रानी देवी गृहणी थी I जयप्रकाश नारायण की प्रारंभिक शिक्षा गांव से ही हुई और माध्यमिक शिक्षा और स्कूलिंग पटना से I सिर्फ 18 साल की उम्र में जयप्रकाश नारायण की शादी प्रभावती देवी से हुई I प्रभावती देवी शादी के समय सिर्फ 14 साल की थी, जिन्होंने आज़ादी के लिए चलाये गए आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया I आज़ादी के आंदोलन के दौरान उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद द्वारा स्थापित बिहार विद्यापीठ में दाखिला ले लिया I जयप्रकाश नारायण ने  ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए शुरू किये गए सविनय अवज्ञा आंदोलन, असहयोग आंदोलन और भारत छोडो आंदोलन में भाग लिया और कई बार गए जेल गए I
उच्च शिक्षा- बिहार विद्यापीठ में पढाई के दौरान ही जयप्रकाश नारायण ने उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाने का निर्णय लिया I साल 1922 में जयप्रकाश नारायण अमेरिका के कलिफोर्निआ पहुंचे और 1923 में बर्कले (बर्कले)  में दाखिला लिया I इस दौरान अपनी कॉलेज की फीस भरने के लिए जयप्रकाश नारायण ने कसाईखाना और कारखाना में मज़दूर की तरह काम किया I लेकिन फिर भी फीस न भर पाने की वजह से जयप्रकाश नारायण को बर्कले (बर्कले) छोड़ना पड़ा और लोवा विश्विद्यालय में दाखिला लेने के लिए मज़बूर होना पड़ा I  जयप्रकाश नारायण की ज़िन्दगी का ये वो दौर था, जब उन्होंने मज़दूरों के साथ काम किया और उनकी समस्याओं को काफी करीब से देखा और महसूस किया I
रूसी क्रांति का प्रभाव (Influenced by Russian revolution) - अमेरिका में पढाई के दौरान उन्होंने 1917 में हुए रूसी क्रांति के बारे में सुना I समाजशास्त्र में गहन रूचि के कारण जयप्रकाश नारायण ने रुसी क्रांति के कारण ,सफलता और प्रभाव का गहन अध्ययन किया और रुसी क्रांति में बड़ी भूमिका अदा करने वाले कार्ल मार्क्स की किताब 'दास कैपिटल' पढ़ा I 'दास कैपिटल' का जयप्रकाश नारायण के ऊपर काफी बड़ा प्रभाव पड़ा I इसी दौरान जयप्रकाश नारायण वामपंथी विचारधारा से ताल्लुक रखने वाले एम. एन. रॉय के संपर्क में आये I जयप्रकाश नारायण ने समाजवाद के ऊपर कई लेख और शोधपत्र प्रकाशित किया जिनमे 'सोशल वारिएशन(Social Variation)' को साल का सर्वश्रेष्ठ शोधपत्र घोषित किया गया I
आज़ादी के आंदोलन में उनकी भूमिका- 1929 में भारत लौटने के बाद जयप्रकाश नारायण ने कांग्रेस ज्वाइन कर लिया और आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय रूप से कूद पड़े I भारत छोडो आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के लिए उन्हें कई बार जेल भेजा गया I इस दौरान उनकी मुलाकात राममनोहर लोहिया, बसावन सिन्हा, अशोक मेहता जैसे नेताओ से हुई जो आगे के आंदोलन में उनके साथ खड़े हुए I आज़ादी की लड़ाई के दौरान जयप्रकाश नारायण कांग्रेस के अलावा अन्य कई संगठनो से जुड़े और  नेतृत्व किया I 1947 में आज़ादी के बाद जयप्रकाश नारायण रेलवे मज़दूरों के सबसे बड़े संगठन 'आल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन (All India Railways Mens Fe)' के अध्यक्ष बने और 1953 तक इस पद पर बने रहे I
नव -निर्माण आंदोलन- गुजरात में आर्थिक मंदी, बेतहासा बढ़ती कीमतें और भ्रस्टाचार के विरोध में गुजरात के मध्यम वर्ग ने विद्रोह शुरू किया जिसे 'नव -निर्माण आंदोलन' के नाम से जाना गया I नव -निर्माण आंदोलन की शुरुआत 1973 में हुई जब अहमदाबाद इंजीनियरिंग कॉलेज और गुजरात विश्वविद्यालय के छात्रों ने फीस बढ़ोतरी के विरोध में हड़ताल कर दिया I गुजरात के छात्रों ने आंदोलन को व्यापक रूप देने के उद्देस्य से जयप्रकाश नारायण को इस आंदोलन के नेतृत्व के लिए आमंत्रित किया I जयप्रकाश नारायण ने आमंत्रण स्वीकार कर लिया और छात्र आंदोलन का नेतृत्व किया I इसी दौरान गुजरात में साल 1973 में चिमनभाई पटेल मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनके भ्रष्टाचार में लिप्त होने और कुछ गलत निर्णयों की वजह से राज्य में मंहगाई बढ़ने लगी I जिसकी वजह से मध्यम वर्ग आक्रोश में था I जयप्रकाश नारायण ने मध्यम वर्ग को भी छात्र आंदोलन से जुड़ने का आह्वान किया I जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर गुजरात के मध्यम वर्ग इस आंदोलन से जुड़ गए I मध्यम वर्ग के इस आंदोलन से जुड़ने के साथ ही इस आंदोलन ने उग्र रूप ले लिया और सरकार को झुकना पड़ा I गुजरात के मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा और विधान सभा भंग कर दी गई I
बिहार आंदोलन- 1974 में बिहार में तेजी से बढ़ती बेरोज़गारी, मंहगाई और भ्रस्टाचार के विरोध में आंदोलन शुरू किया I जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में सरकार के खिलाफ शुरू किये गए इस शांतिपूर्ण आंदोलन के दौरान बलप्रयोग और पुलिस द्वारा लाठीचार्ज के कारण काफी लोग मारे गए I जिसके बाद इस आंदोलन ने पहले राज्यव्यापी और फिर देशव्यापी आंदोलन का रूप ले लिया I बिहार में इस आंदोलन से सत्येंद्र नारायण सिन्हा, दिग्विजय नारायण सिंह जैसे और भी नेता जुड़ गए और सरकार को बर्खास्त करने की मांग करने लगे I इसी बिहार आंदोलन ने बाद में भारत में आज़ादी के बाद के सबसे बड़े आंदोलन का रूप ले लिया, जिसे 'समग्र आंदोलन' के नाम से जाना जाता है I
समग्र आंदोलन- जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में पहले नव-निर्माण आंदोलन, गुजरात फिर बिहार आंदोलन ने सरकार की नींव को हिला कर रख दिया था I सरकार ने जितना ही बिहार आंदोलन को दबाने का प्रयास किया यह उग्र होता ही गया I जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में यह आंदोलन पुरे देश में फ़ैल गया I तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए बलप्रयोग करना शुरू कर दिया, जिससे यह आंदोलन और उग्र होता गया I जयप्रकाश नारायण ने पुरे देश के छात्रों से कांग्रेस सरकार के तानाशाही रवैये के खिलाफ एकजुट होकर आंदोलन को सफल बनाने का आह्वान किया I इस आह्वान का व्यापक असर दिखा और पुरे देश से छात्रों ने इस आंदोलन में सक्रिय रूप से भागीदारी दिखाई I छात्रों के जुड़ने के बाद आंदोलन और भी उग्र हो गया पुरे देश में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन होने लगा और सरकार को बर्खास्त करने की मांग उठने लगी I
आपातकाल- साल 1975 मे इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 1971 के आम चुनावों में प्रधानमंत्री इंंदिरा गांधी द्वारा सरकारी तंत्र के दुरुपयोग का दोषी ठहराया गया और रायबरेली से उनके निर्वाचन को रद्द कर दिया और 6 साल तक किसी भी तरह के चुनाव के लिए प्रतिबंधित कर दिया। अदालत मे यह केस 1971 के आम चुनाव में रायबरेली लोक सभा सीट से इंंदिरा गाँधी के खिलाफ विपक्ष के उम्मीदवार राजनारायण ने दायर की थी। आजाद भारत में इस तरह का यह पहला मामला था और इस साहसिक निर्णय के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा को विपक्ष समेत पूरे भारत ने सैल्ययू किया । एक तरफ समग्र आंदोलन और दूसरे तरफ अदालत के फैसले के कारण इंदिरा गाँधी को अपनी सत्ता हाथ से जाती दिखी । अपने को बचााने के लिए इंंदिरा गांधी ने भारत के इतिहास में पहली बार संविधान की धारा 352 के तहत 'आंतरिक आपातकाल' घोषित कर दिया गया I इस तिथि को भारत के इतिहास में 'काला दिन' माना जाता है I आपातकाल के बाद सभी तरह के चुनावो पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, नागरिको के मुलभुत अधिकार छीन लिए गए, मीडिया पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, हर एक संस्था और व्यक्ति जो सरकार के खिलाफ बोलता उसे जेल में डाल दिया जाता I अधिकारों का केन्द्रीयकरण कर दिया गया मतलब राज्य सरकार के अधिकार अब  हस्तांतरित हो गया I एक तरफ जहाँ इंदिरा गाँधी हर तरीके से आंदोलन को कुचलने पर लगी हुई थी, दूसरी तरफ जयप्रकाश नारायण झुकने को तैयार नहीं थे I उन्होंने इंदिरा गाँधी सरकार खिलाफ के आंदोलन और तेज कर दिया I जयप्रकाश नारायण ने 'इंदिरा हटाओ देश बचाऒ का नारा दिया, जयप्रकाश नारायण को गिरफ्तार कर लिया I गया इसके बाद अटल बिहारी बाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नाडिस जैसे नेताओ ने आंदोलन की कमान संभाली, इस सभी नेताओ को भी गिरफ्तार कर लिया गया I धीरे- धीरे करके सभी विपक्षी नेताओ को कारागार में डाल दिया गया I I लेकिन यह आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा था I 21 महीने तक चले इस आंदोलन के दौरान लाखो लोगो को गिरफ्तार कर लिया गया I यह 21 महीने आज़ादी के बाद के सबसे बुरे महीने साबित हुए I
सत्ता  परिवर्तन- आपातकाल लगाने के बाद भी आंदोलन थमा नहीं और अन्तत इंदिरा गाँधी को जयप्रकाश नारायण के आगे झुकना पड़ा I 21 महीने के बाद 21 मार्च,1977 को आपातकाल हटा दिया गया और जयप्रकाश नारायण सहित सभी नेताओ को रिहा कर दिया गया I जयप्रकाश नारायण की मांग पर देश में आम चुनाव की  घोषणा की गई I जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गाँधी को सत्ता से उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया I लेकिन यह अविश्वसनीय प्रतीत हो रहा था, क्योकि भारत में गैर कांग्रेसी सरकार की कल्पना भी करना हास्यास्पद लग रहा था I लेकिन जयप्रकाश नारायण कमर कस चुके थे जयप्रकाश नारायण ने सभी विपक्षी दलों को एक झंडे के नीचे लाने का आह्वान किया I जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर वामपंथी पार्टियों को छोड़ सभी प्रमुख विपक्षी दल जनता पार्टी के बैनर के नीचे आ गए I 1977 में हुए आम चुनाव में अविश्वसनीय तरीके से कांग्रेस की हार हुई और जनता पार्टी पूर्ण बहुमत से जीत कर आयी I यहाँ तक की  इंदिरा गाँधी  और उनके बेटे संजय गाँधी खुद चुनाव हार गए I पुरे देश से एकमत में आवाज़ उठी कि इस अविश्वसनीय और अविश्मरणीय जीत के नायक रहे जयप्रकाश नारायण को प्रधानमंत्री बनाया जाये I लेकिन जयप्रकाश नारायण ने बड़ी विनम्रता से यह कहते हुए कोई भी पद लेने से इंकार कर दिया कि मेरा आंदोलन इस तानाशाही सरकार को हटाने के लिए था, मेरा उद्देस्य पूरा हुआ देश को लोकतान्त्रिक सरकार मिली मुझे सत्ता में कोई दिलचस्पी नहीं है I भारतीय राजनीति में त्याग और समर्पण का शायद ही इस तरह का दूसरा कोई मिसाल हो I यहाँ तक की नई सरकार के गठन और निर्णयों में भी कभी हस्तक्षेप नहीं किया I
मृत्यु- सामान्य जिंदगी व्यतीत करते हुए 8 अक्टूबर, 1979 को पटना में 77 साल की उम्र में जयप्रकाश नारायण का देहावसान गया I
सम्मान और अवार्ड- 
  1. 1965 में उन्हें लोक सेवा के लिए 'रमन मेग्सेसे ' अवार्ड से सम्मानित किया गया जिसे एशिया का नोबेल पुरष्कार माना जाता है I
  2. 1999 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया I
  3. लोगो के बीच लोकप्रिय होने और उनके लिए संघर्षरत होने के कारण उन्हें 'लोकनायक' की उपाधि दी गई है I
  4. जयप्रकाश नारायण को ' जेपी' के नाम से जानते है I
  5. प्रकाश झा द्वारा उनकी जिंदगी पर 'लोकनायक' फिल्म बनाई गई I
  6. उनकी जिंदगी पर आधारित सौ से ज्यादा किताबे प्रकाशित की जा चुकी है I
  7. पटना एयरपोर्ट का नामकरण उनके नाम से किया गया है I
  8. कई योजनाओ, ट्रेनों और सरकारी संस्थाओ का नामकरण उनके नाम पर किया गया है I


Saturday, March 23, 2019

किशोर कुमार- मिलेनियम सिंगर

"किशोर कुमार ने जब भी किसी के साथ गाना गया, चाहे वह पुरुष गायक हो या महिला उस गाने में सिर्फ किशोर कुमार ही छाये रहे " I 
                                            - जावेद अख्तर 
किशोर कुमार एक ऐसा नाम जो पर्याय है भारतीय पार्श्व गायन का बिना भारतीय संगीत अधूरा है I एक ऐसा बहुमुखी कलाकार जो एक बेहतरीन गायक होने के साथ-साथ एक बेहतरीन अभिनेता, संगीतकार, निर्माता, निर्देशक और गीतकार भी थे I तक़रीबन तीन दशक तक भारतीय सिनेमा पर एकछत्र राज करने वाले किशोर कुमार एक अच्छे कलाकार के अलावा ज़मीन से जुड़े हुए एक अच्छे इंसान थे I
प्रारंभिक जीवन-
भारतीय सिनेमा के शिखर पुरुष किशोर का जन्म मध्य प्रदेश के खंडवा में 4 अगस्त,1929 को एक बंगाली परिवार में हुआ था I इनके पिता कुंजलाल गांगुली एक वकील और माता गौरी देवी गृहणी थी I किशोर कुमार के बचपन का नाम आभाष कुमार गांगुली था और किशोर कुमार अपने चार भाई-बहनो अशोक कुमार, अनूप कुमार, गीता देवी में सबसे छोटे थे I अशोक कुमार भी भारतीय सिनेमा में बहुत बड़े नाम है और इन्हे भारतीय सिनेमा के लिए सर्वोच्च सम्मान 'दादा साहब फ़ालके ' दिया जा चूका है, दूसरे भाई अनूप कुमार ने भी कुछ फिल्मो में अभिनय किया I किशोर कुमार का प्रारंभिक जीवन खंडवा में ही बीता किशोर कुमार की शिक्षा-दीक्षा भी खंडवा से ही हुई I
 फ़िल्मी करियर (संघर्ष का दौर)- 1940 के दशक में किशोर कुमार के बड़े भाई अशोक कुमार भारतीय सिनेमा में अभिनय के क्षेत्र में अपनी पहचान बना चुके थे, और यही कारण है किशोर कुमार के परिवार का मुंबई आना- जाना लगा रहता था I किशोर कुमार का बचपन का शौक गायक बनने का था और उस समय के महान गायक कुन्दनलाल सहगल के आवाज़ की नक़ल करते थे I किशोर कुमार कुंदन लाल सहगल को ही अपना गुरु मानते थे I लेकिन अशोक कुमार चाहते थे कि किशोर कुमार अभिनेता बने I अशोक कुमार के सिफारिश पर किशोर कुमार को कुछ फिल्मो में अभिनय और गायन का मौका मिला, जिनमे प्रमुख थे 'शिकारी' और 'ज़िददी I 1946 से 1955 के बीच 20 से ज्यादा फिल्मो में किशोर कुमार ने अभिनय और गायन किया , लेकिन ज्यादातर फिल्मे फ्लॉप रही I कुछ चली भी तो किशोर कुमार को कोई खाश पहचान नहीं मिला I 1955 के बाद आयी फिल्म 'नौक़री' किशोर कुमार के लिए काफी अच्छी रही और इनके अभिनय को सराहा गया I फिर कुछ और फिल्मो जैसे 'बाप रे बाप' की  वजह से अभिनय में किशोर कुमार को पहचाना जाना लगे I
                                                  किशोर कुमार अपने अभिनय से संतुष्ट नहीं थे, उन्हें कहीं ना कहीं यह लग रहा था कि वह अपने सपने को दफ़न कर रहे है I लेकिन उनके बड़े भाई अशोक कुमार की ज़िद्द थी किशोर कुमार को अभिनेता बनाने की I अशोक कुमार ने हालाँकि शुरूआती दौर में किशोर कुमार को गाने का मौका दिलाया काफी फिल्मो में लेकिन लोगो को किशोर कुमार की आवाज़ पसंद नहीं आयी I निर्माता- निर्देशक भी अब किशोर कुमार को गायन में मौका नहीं देना चाहते थे, जिसके दो प्रमुख कारण थे पहला किशोर कुमार को शास्त्रीय संगीत की जानकारी नहीं थी जिसके बिना गायन संभव नहीं और दूसरा किशोर कुमार की अपनी कोई आवाज़ नहीं थी वह कुन्दनलाल सहगल की नक़ल करते थे I उस दौर के  प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक ने यह तक कह दिया कि तुम खंडवा वापिस चले जाओ तुम्हारे बस का गायन और अभिनय नहीं है I उस समय के प्रसिद्ध संगीतकार सचिनदेव बर्मन ने किशोर कुमार की आवाज़ सुनी और काफी प्रभावित हुए I सचिनदेव बर्मन ने किशोर कुमार को कुन्दनलाल सहगल की नक़ल करने की बजाय खुद की ओरिजिनल आवाज़ में गाने का सुझाव दिया और फिर किशोर कुमार ने अपनी स्वाभाविक आवाज़ में गाना शुरू किया I 1964 में आयी फिल्म 'दूर गगन की छाँव में ' का एक गीत ' आ चल के तुझे मैं लेके चलु एक ऐसे गगन के तलें' ज़बरदस्त हिट हुआ I फिर एक के बाद एक लगातार हिट  गानों ने किशोर कुमार को शिखर पे पहुंचा दिया, जहाँ वह मरते दम तक अडिग रहे I 1964 से लेकर 1987 का दौर किशोर कुमार के नाम रहा इस दौरान उनके गाने लोगो के सर चढ़ कर बोले I
फ़िल्मी करियर ( एक गायक के रूप में )- किशोर कुमार ने उस दौर के लगभग सभी प्रमुख अभिनेताओं संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, देव आनंद, विनोद खन्ना, शशि कपूर,धर्मेंद्र, जीतेन्द्र, मिथुन चक्रवर्ती, ऋषि कपूर, विनोद महरा, रजनीकांत, अनिल कपूर, संजय दत्त, सनी देओल, राकेश रोशन, दिलीप कुमार, शम्मी कपूर, के लिए अपनी आवाज़ दी I भारतीय सिनेमा के दोनों सुपरस्टार्स को तो किशोर के आवाज़ से ही पहचान मिली और उन्हें इस मुकाम तक पहुंचने में किशोर का बहुत बड़ा हाथ था I शास्त्रीय संगीत की कोई जानकारी न होने के बावजूद किशोर कुमार ने हर तरह के गाने गाये I किशोर कुमार की शैली बड़ी अनोखी थी वह जब भी किसी अभिनेता के लिए गाना गाते थे, लोगो को लगता उस अभिनेता की खुद की आवाज़ है I हर एक गाने को गाने का उनका अपना अलग स्टाइल था, जो शायद ही किसी  और गायक में देखने को मिली हो I किशोर कुमार ने उस दौर के सभी प्रमुख संगीतकारों सलिल चौधरी, खेमप्रकाश, हेमंत कुमार, सचिन देव बर्मन के साथ काम किया, लेकिन राहुलदेव बर्मन के साथ उनकी जोड़ी सबसे ज्यादा हिट रही I अपने 30 सालो के करियर में हिंदी, बंगाली, पंजाबी सहित 10 से ज्यादा भाषाओ के 1,200 से ज्यादा फिल्मो में करीब 2,700 से ज्यादा गाने गाये जो, अपने आप में उनकी महानता को बताता है I
फ़िल्मी करियर (एक अभिनेता के रूप में )-
किशोर कुमार ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत एक अभिनेता   के तौर पर ही की थी I 1946 से लेकर 1987 तक तक़रीबन 90 फिल्मो में किशोर कुमार ने अभिनय किया और एक अमिट छाप छोड़ा I मि. एक्स इन बॉम्बे, पड़ोसन, चलती का नाम गाड़ी, दिल्ली का ठग, झुमरू, जालसाज़ जैसे फिल्मो से उन्होंने अभिनय का लोहा मनवाया I
फ़िल्मी करियर (एक निर्माता- निर्देशक, गीतकार और संगीतकार के रूप में )- किशोर कुमार बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे I गायन और अभिनय के अलावा काफी सफल फिल्मो का निर्देशन भी किया और कुछ फिल्मो में  गीतकार और संगीतकार के तौर पे अपनी पहचान बनाई I ' चलती का नाम  गाड़ी', 'झुमरू' जैसे फिल्मो का निर्देशन कर किशोर कुमार ने निर्देशन में अपनी अलग पहचान बनाई I
वैवाहिक जीवन-
किशोर कुमार का फ़िल्मी करियर जितना ही शानदार रहा उनकी व्यक्तिगत जिंदगी उतनी ही उतार-चढाव वाली रही I किशोर कुमार ने चार शादियां की लेकिन एक भी सफल नहीं रही किशोर कुमार की शादी 1950 में बंगाली अभिनेत्री रुमा घोष से हुई थी, जो सिर्फ 8 सालो तक चली I किशोर कुमार ने दूसरी शादी 1960 में हिंदी फिल्मो की मशहूर अभिनेत्री मधुबाला से की, जो मधुबाला के मृत्यु के साथ ही ख़तम हो गई I 1976 में किशोर कुमार ने तीसरी शादी योगिता बाली से की जो सिर्फ दो साल चली I 1980 में किशोर कुमार ने चौथी शादी लीना चन्द्रावरकर से की I किशोर कुमार के दो बेटे है पहली पत्नी रुमा घोष से अमित कुमार जो बाद में मशहूर गायक बने और लीना चंद्रावरकर से सुजीत कुमार I
मृत्यु-
किशोर कुमार की जब मृत्यु हुई (13 अक्टूबर,1987 ) उस समय वह अपने करियर के उचाईयों पर थे और एक फिल्म का निर्देशन भी कर रहे थे I अपने अंतिम दिनों में लता मंगेशकर को दिए एक इंटरव्यू के दौरान किशोर कुमार ने कहा था कि उनकी इच्छा है अब जबकि वह अपनी करियर की उचाईयों पर है तो मुंबई हमेशा के लिए छोड़ दे और वापिस खंडवा चले जाये, इस फ़िल्मी नगरी से दूर लेकिन उनकी यह इच्छा  नहीं हो सकी I
किशोर कुमार के बारे में कुछ अनसुने तथ्य- 
  • बहुत कम लोग जानते है कि आवाज़ का यह जादूगर बचपन में तोतला था उनके बड़े भाई अशोक कुमार ने बताया था कि एक बार किशोर कुमार के पैर की एक ऊँगली कट गई जिसके कारण किशोर कुमार रोते रहते थे जिससे उनकी आवाज़ साफ़ हो गई I
  • किशोर कुमार ने राजेश खन्ना के लिए 92 फिल्मो में करीब 250 से ज्यादा गाने गाये जो अपने आप में एक रिकॉर्ड  है I
  • किशोर कुमार को 8 बार फिल्म फेयर अवार्ड मिला जो अब तक का रिकॉर्ड है I
  • किशोर कुमार 21 बार फिल्म फेयर अवार्ड के लिए नामित किया गया जो अब तक का रिकॉर्ड है I
  • भारतीय सिनेमा के इतिहास में किशोर कुमार एकमात्र गायक थे, जिन्होंने संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी, बावजूद इसके किशोर कुमार ने हर तरह के गीत गाये I  
  • अभिनेता आते-जाते रहे लेकिन किशोर कुमार लगातार 25 सालो तक फिल्म इंडस्ट्री पे छाये रहे I जिस समय किशोर कुमार की मृत्यु हुई, वह अपनी करियर की उचाईयो पर थे I
  • 1975 में देश में आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने किशोर कुमार से अपनी पार्टी के लिए कुछ गीत गाने को बोला जिसे किशोर कुमार ने मना कर दिया I जिसके कारण आल इंडिया रेडियो पर उनके गाने को प्रतिबंधित कर दिया गया था I
  • इतनी शोहरत के बावजूद किशोर कुमार का अंतिम समय काफी अकेलेपन में बीता पत्रकार प्रीतीश नंदी को 1985 में दिए इंटरव्यू के दौरान किशोर कुमार ने कहा था कि करियर के उचाईयों पर होने के बावजूद आज मैं अकेला हु और सिर्फ यह फूल ही है जो मेरे सच्चे साथी है I
  • किशोर कुमार मुंबई की भागदौड़ से परेशान हो चुके थे लता मंगेशकर को दिए इंटरव्यू के दौरान किशोर कुमार ने खंडवा वापिस जाने की इच्छा ज़ाहिर की थी I
  •  किशोर कुमार कहा करते थे फिल्म इंडस्ट्री के लोग दोहरे चरित्र वाले है और खंडवा के लोगो जैसे नहीं है I
  • लता मंगेशकर ने अपने जीवन में एकमात्र इंटरव्यू किशोर कुमार का ही लिया था I
  • अभिनेता आते-जाते रहे लेकिन किशोर कुमार लगातार 25 सालो तक फिल्म इंडस्ट्री पे छाये रहे I
  • किशोर कुमार की होम प्रोडक्शन फिल्म ' चलती का नाम गाड़ी ' काफी सफल रही और इस फिल्म में किशोर कुमार के साथ उनके दोनों भाइयो अनूप कुमार और अशोक कुमार ने भी किया I
  • किशोर कुमार की होम प्रोडक्शन फिल्म ' चलती का नाम गाड़ी ' की शूटिंग के दौरान ही किशोर कुमार और मधुबाला नजदीक आये और बाद में शादी की I
  • किशोर कुमार सिद्धांतवादी इंसान थे जो किया अपनी शर्तो पे किया I 
सम्मान और  पुरष्कार- वैसे तो कुछ शख्शियत ऐसे होते है जो हर सम्मान और पुरष्कार से ऊपर होते है, किशोर कुमार भी उन्ही में से थे I फिर भी उनको दिए गए सम्मानों की अगर बात करे तो-

  • फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड 1970 ( रूप तेरा मस्ताना ) फिल्म- आराधना
  • फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड 1971  ( दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा  ) फिल्म- अमानुष 
  • फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड 1979  ( खाइके पान बनारस वाला ) फिल्म- डॉन 
  • फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड 1981  ( हज़ार रहे मुड़के देखे ) फिल्म- थोड़ी सी बेवफाई 
  • फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड 1983  ( पग घुंघरू बांध ) फिल्म- नमक हलाल 
  • फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड 1984  ( अगर तुम न होते  ) फिल्म- अगर तुम न होते 
  •  फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड 1985  (मंज़िले अपनी जगह ) फिल्म- शराबी 
  • फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड 1986  ( सागर किनारे ) फिल्म- सागर 
  • 1971 में फिल्म आराधना के लिए बेस्ट प्लेबैक सिंगर का अवार्ड 
  • 1972  में फिल्म अंदाज़ के लिए बेस्ट प्लेबैक सिंगर का अवार्ड 
  • 1974  में फिल्म हरे रमा हरे कृष्णा के लिए बेस्ट प्लेबैक सिंगर का अवार्ड
  • 1975  में फिल्म कोरा कागज़ के लिए बेस्ट प्लेबैक सिंगर का अवार्ड 
  • इसके अलावा मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उनके सम्मान में हर साल किशोर कुमार अवार्ड दिया जाता है I 
  • अनुराग बासु द्वारा उनकी बायोपिक बनाई जा रही है जिसमे मुख्य भूमिका रणबीर कपूर की होगी  I

Thursday, March 21, 2019

गरीब बनाम अमीर- आदतों का तुलनात्मक अध्ययन

" गरीब लोगों के पास बड़ा टेलीविजन होता है जबकि अमीर लोगों के पास बड़ा पुस्तकालय ".
                                                                            - जिम रॉन 
नेपोलियन हिल की बेस्ट सेलर किताब 'थिंक एंड ग्रो रिच ' में हिल ने जब सफल और अमीर लोगो की आदतों का अध्ययन किया, तो पाया कि वह सफल और अमीर इसलिए है क्योकि उनकी सोच अमीरो वाली है I इंसान की जिस तरह की आदते होती है और वह जिस तरह की सोच रखता है, निश्चित रूप से वह उसी तरीके से बन जाता है I इस किताब को पढ़ने से पहले मुझे भी यही लगता था कि सफल होना या अमीर होना भाग्य बात है, लेकिन इस किताब को पढ़ने के बाद मुझे समझ आया कि अगर कोई सफल या अमीर है तो वह इसलिए क्योकि उसकी सोच वैसी है I इस किताब के अलावा रोबर्ट कियोसोकि द्वारा लिखित किताब '  रिच डैड पुअर डैड ' का  अध्ययन किया, तो गरीब मानसिकता वाले लोग और अमीर मानसिकता वाले लोगो में कुछ सामान्य अंतर जो मुझे समझ में आया  वह है I

  1. बचत की आदत (Saving habit)- दुनिया के तीसरे सबसे अमीर इंसान और निवेशक वारेन बफेट के अनुसार " इंसान को बचत के बाद बचे पैसे को खर्च करना चाहिए , नाकि खर्च के बाद बचे पैसे को बचत करना चाहिए" I एक गरीब मानसिकता वाला इंसान हमेशा अपनी कमाई में से पहले खर्च करता है और अगर कुछ बचा तो ही बचत के बारे में सोचता है, जबकि अमीर इंसान पहले अपनी कमाई में से बचत के लिए पैसे निकाल लेता है और बचे हुए पैसे को खर्च करता है  I साल 2008 की बात है मै जहाँ रहता था उसके ठीक सामने दो लोग किराये के मकान में रहा करते थे मिस्टर गुप्ता और मिस्टर सिन्हा I मिस्टर गुप्ता की महीने की कमाई मिस्टर सिन्हा से बिलकुल आधी थी, लेकिन मिस्टर गुप्ता की आदत थी अपनी कमाई का 25% बचत करना उसके बाद ही वह बाकि खर्चो के बारे में सोचते थे I मिस्टर सिन्हा का स्वभाव बिलकुल विपरीत था वह पहले खर्च करते थे फिर अगर कुछ बचा तो बचत करते थे I आज 11 साल बाद जब उनसे मिला तो मिस्टर सिन्हा आज भी किराये के मकान में रहते है, जबकि मिस्टर गुप्ता ने अपना घर ले लिया I यह कहानी सिर्फ मिस्टर गुप्ता और मिस्टर सिन्हा की नहीं है, आपको अपने आसपास बहुत सारे ऐसे लोग मिल जायेंगे जो अच्छा कमाने के बावजूद वित्तीय रूप से परेशान रहते है I 
  2. निवेश की आदत (Investment habit) - गरीब मानसिकता वाले लोग के पास अगर कुछ बचत है भी तो हमेशा उसको अपने पास रखेंगे या ऐसी जगह निवेश करेंगे जहाँ जोखिम ना हो I जबकि अमीर मानसिकता वाले लोग हमेशा अपने बचत को वहां लगाते है जहाँ से उन्हें अच्छी आय हो I अर्थात हमे सिर्फ बचत  ही नहीं करना है बल्कि सही जगह निवेश भी करना है I चलिए एक उदहारण से इसे समझते है, चार दोस्त अमित, रवि, प्रीति और अंशु जिन्होंने अपनी बचत की रकम ₹1,00,000 अलग- अलग जगह निवेश किया I  अमित ने बचत की रकम अपने पास ही रखी क्योकि वह किसी तरह का जोखिम लेने को तैयार नहीं था, रवि भी जोखिम से बचना  चाहता था इसलिए बैंक के सेविंग अकाउंट में यह जमा कर दिया जहाँ से उसे 4 % ब्याज मिलता है, प्रीति थोड़ा सा जोखिम लेने को तैयार थी इसलिए बैंक में फिक्स्ड डिपाजिट करा दिया जहाँ उसे 7 % ब्याज मिलेगा, अंशु जोखिम लेने को तैयार थी इसलिए म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश कर दिया जहाँ उसे तक़रीबन 15 % आय मिलेगा  I महंगाई दर अगर 4 % है तो देखते है इन चारो का ₹1,00,000 पांच साल बाद कितना बन जायेगा  I ( निवेश+आय - मंहगाई ) अमित (1,00,000 + 0 - 20,000) = 80,000, रवि (1,00,000 + 20,000 - 20,000) = 1,00,000, प्रीति (1,00,000 + 35,000 - 20,000) = 1,15,000, अंशु ( 1,00,000 + 75,000 - 20,000) = 1,55,000
  3.  संपत्ति निर्माण (Asset creation)- गरीब इंसान विलासी वस्तुओ जैसे मोटरकार, महंगे  कपडे, महंगे  जुटे पर ज्यादा खर्च करता है और उसके लिए क़र्ज़ लेने को भी तैयार हो जाता है I अब इसके तीन  नुकसान है पहला आप ब्याज के रूप में उस सामान के लिए मूल्य से अधिक भुगतान कर रहे, दूसरा यह ऐसे सामान है जिनकी कीमत लगातार कम होनी है, तीसरा क़र्ज़ की वजह से दायित्य बढ़ गया I अमीर इंसान की सोच हमेशा ऐसी चीज़ो पे पैसे लगाने की होती है, जिससे संपत्ति निर्माण हो जैसे ज़मीन या बिल्डिंग खरीद कर किराया पर लगा देना, निवेश कर देना अब इससे इनका एक तो संपत्ति निर्माण हो रहा है दूसरा नियमित रूप से इससे आय आ रहा I 
  4. दीर्घकालिक दृश्टिकोण (Long term perspective) -  गरीब मानसिकता वाले लोगो की पैसे और निवेश के मामले में दृष्टिकोण हमेशा अल्पकाल के लिए होता है, जबकि अमीर हमेशा दीर्घकालीन दृष्टिकोण रखते है I जैसे मोटरकार की अभी जरुरत है तो उसे किसी भी दशा में खरीदना है, चाहे इसके लिए क्यों न लोन लेना पड़े लेकिन I अमीर लोगो की सोच इसके ठीक विपरीत है वह सोचते है अभी तत्काल में मोटरकार की जरुरत है, लेकिन अभी हम मोटरकार खरीदने की जगह पब्लिक ट्रांसपोर्ट से भी काम चला सकते है I जब हम इस स्थिति में होंगे कि हम बिना लोन लिए इसको खरीद सके तभी इसको खरीदेंगे I
  5.  सीखने की भूख (Hunger for learning)- किसी इंसान की नौकरी लग गई या कोई छोटा व्यापारी है अब वह 10 से 6 काम पे जायेगा और घर आने के बाद टेलीविजन देखेगा I क्योकि उसे लगता है कि अब तो उसकी ज़िन्दगी स्थिर है, और अब उसे कुछ नया सीखने की जरुरत नहीं है I लेकिन अमीर इंसान हमेशा नयी चीज़े सीखने के लिए लालायित रहता है I वह हमेशा कुछ नए आईडिया के बारे में सोचता रहता और अपने को समय के साथ समायोजित कर लेता है I कैसे वह अपने काम को आगे बढ़ा सकता है, अतिरिक्त आय के क्या-क्या साधन हो सकते है, किन नयी तकनीकों सहारे वह व्यवसाय उचाईयो पे ले जा सकता है I भारत के सबसे बड़े कॉर्पोरेट समूह टाटा ग्रुप के प्रमुख रतन टाटा उम्र के इस पड़ाव पर भी नयी चीज़े सीखते रहते है और पूरा टाइम सक्रिय रहते है जब कि वह रिटायरमेंट ले चुके है I 
  6. किताब के प्रति प्रेम ( Book Lover)- क्या आपने कभी लैंड रोवर(Land Rover), जैगुआर(Jaguar), लैम्बोर्गिनी(Lamborgini) और मर्सिडीज़(Mercedez) का विज्ञापन टेलीविजन पे देखा है, नहीं I क्योकि इन कम्पनीज को पता है कि जिन लोगो के पास  इतनी क्षमता है इन गाड़ियों को खरीदने का, वह टेलीविजन नहीं देखते और जो लोग टेलीविजन देखते है उनके पास इतनी क्षमता नहीं है कि वह इन गाड़ियों को खरीद सके I गरीब मानसिकता रखने वाले लोग हमेशा टेलीविजन पर अपना समय देते है जबकि अमीर लोग हमेशा अपना समय किताब पढ़ने के लिए देते है I भारत के सबसे बड़े व्यावसायिक समूह टाटा ग्रुप के प्रमुख रतन टाटा, दुनिया के सबसे अमीर इंसान बिल गेट्स, दुनिया के सबसे बड़े निवेशक वारेन बफेट, एशिया के सबसे जैक मा इतने व्यस्त होने के बावजूद दिन में 4-5 घंटे किताब पढ़ने के लिए देते है I

Wednesday, March 20, 2019

कहाँ तुम चले गए

विश्व गौरैया दिवस (World Sparrow  Day ) पर विशेष 
मुझे आज भी याद है होश सँभालने के बाद तुम्हारा पहला दीदार जब तुम्हे घर के आँगन में चहकते हुए देखा था ,फिर तो हमारा यह दिनचर्या का हिस्सा बन गया I तुम सुबह-सुबह प्रतिदिन घर के आँगन में आ जाया करती थी, मैं तुम्हे देखता और पकड़ने का असफल प्रयास करता I लेकिन तुम्हारी भी जिद्द थी हाथ न आने की I फिर स्कूल से आते ही अपना खेल शुरू हो जाता, तुम सामने नीम के पेड़ पर बैठके मुझे खेलते हुए देखती और मैं तुम्हे देखके मुस्कराता रहता I अँधेरा होते ही अगले दिन मिलने का वादा कर और एक दूसरे को अलविदा कह हम दोनों अपने-अपने घर के लिए चले जाते थे I मुझे याद नहीं तुमने कभी अपने मिलने का वादा तोड़ा हो या कभी मिलने आने में देरी की हो I हाँ मैंने कई बार तुमसे वादा जरूर तोड़ा, कभी-कभी देर से मिलने आया, लेकिन तुमने कभी शिकायत नहीं किया I मुझे वह जून के महीने का दोपहर भी अच्छे से याद है,जब तुम घर के अंदर आ गई थी और मैंने तुम्हे धोखे से पकड़ लिया था I लेकिन तुम अच्छे से इस बात से परिचित थी कि मेरा इरादा तुम्हे नुकसान पहुँचाने का नहीं था I हां वह होली का दिन कैसे भूल सकता हु, जब मैंने तुम्हे पकड़ लिया था और लाल- हरे रंग से नहला कर तुम्हे उड़ने के लिए आज़ाद कर दिया था I इन सब के बीच हमें कब एक दूसरे की आदत लग गई, शायद समझ नहीं आया I मुझे ऐसा कोई दिन याद नहीं, जब हम ना मिले हो, समय के साथ हमारा प्यार बढ़ता ही गया I घर के आँगन में तुम्हे फुदकते-फुदकते दाने चुगते हुए देखने का तो आनंद ही कुछ और था जिसको शब्दों में बयां करना संभव नहीं I
                                                लेकिन मोबाइल आने के बाद मैंने तुमसे मिलना कम कर दिया और तुमने आना भी कम कर दिया I क्योकि तुम्हे पता था कि अब मुझे तुम्हारी जरुरत नहीं रही या शायद तुम्हारी जगह अब वह मोबाइल ले चूका था I अब हमारे बीच मोबाइल आ चूका था और शायद हम तीनो एक साथ नहीं रह सकते थे I इसलिए तुम मेरी ख़ुशी की खातिर हमेशा के लिए मुझसे दूर चली गई I मैं भी मोबाइल की बनावटी दुनिया में इस तरीके से खो गया, कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा तुम्हारे जाने का और नहीं मैंने प्रयास किया तुम्हे रोकने का I तुम्हारे चहकने की जगह अब मोबाइल के गानों ने ले लिया था, यूट्यूब के कॉमेडी वीडियो अब तुम्हारी जगह हंसाते थे और सैकड़ो फेसबुक के दोस्तों ने तुम्हारी कमी महसूस नहीं होने दी I
                                                लेकिन हे गौरैया आज मुझे समझ में आया कोई भी संगीत वह सुकून नहीं दे सकती जो सुकून तुम्हारे चहकने से मिला करता था, तुम्हे देखके जो ख़ुशी मिलती थी वह यूट्यूब के कॉमेडी वीडियोस नहीं दे सकते, फेसबुक के सैकड़ो दोस्तों में मुझे एक भी ऐसा नहीं मिला, जिसमे तुम्हारे जितना समर्पण हो I ऐसा भी नहीं है कि मैंने तुम्हे ढूंढने का का प्रयास ना किया हो हिंदुस्तान के हर एक कोने में ढूँढ लिया, लेकिन तुम मुझे कही नहीं मिली I अब जब भी घर आता हु सबसे पहले नज़रे उस आँगन की तरफ जाती है जहां तुम्हारा पहली बार दीदार हुआ था, हां उस नीम की डाली पे भी देखा जहा बैठके तुम मुझे खेलते हुए देखा करती थी है, वह सरसो का खेत भी देखना नहीं भुला जहा तुम कभी- कभी चली जाया करती थी I उस आँगन में भी बार- बार नज़र दौड़ाई, जहाँ तुम फुदकते- फुदकते  दाने चुगने आया करती थी, लेकिन तुम मुझे कही भी नहीं दिखी I हां तुम्हारा रूठना भी लाजमी है क्योकि इन सब के लिए मैं जिम्मेदार था I यह जानते हुए कि मोबाइल टावर से पैदा होने वाले रेडिएशन के बीच तुम ज़िंदा नहीं रह सकती, मैंने मोबाइल को प्राथमिकता दिया I उम्मीद करता हु कि फिर कभी तुम्हारा दीदार हो और फिर मुझे मोबाइल के संगीत की जगह तुम्हारे चहकने की आवाज़ सुनने को मिले और तुम्हे फिर फुदकते-फुदकते हुए घर की आँगन में दाने चुगते हुए देखु I

गौरैया के बारे में कुछ रोचक तथ्य -

  • गौरैया पक्षी भारत समेत एशिया, अमेरिका और यूरोप में पायी जाती है I
  • यह एक घरेलु पक्षी है जो सामान्तया छतो पर या घर के आस पास अपना घोसला बनाती है I
  • इस चिड़िया को घरो में ख़ुशी का प्रतीक माना है I
  • आजसे दस साल पहले तक यह भारत के हर घर में बहुतायत मात्रा में दिख जाती थी, लेकिन मोबाइल रेडिएशन की वजह से लगभग विलुप्त हो चुकी है I
  • इसका वैज्ञानिक नाम पासर डोमेस्टिकस है I
  • गौरैया अब विलुप्त होने के कगार पे पहुंच चुकी है और इसीलिए इसे लाल जोन( रेड जोन) की सूची में रखा गया है I
  • गौरैया को बचाने के लिए 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है जिसकी शुरुआत 2010 में की गई थी I
  • गौरैया के संरक्षण के लिए कई राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय संस्थाए जागरूकता अभियान चला रही है I

Tuesday, March 19, 2019

किताबे जो हर किसी को पढ़ना चाहिए

"सच्चे दोस्त, अच्छी किताबे और गहरी नींद ; यह आदर्श जीवन है "
                                                                - मार्क ट्वेन 
"किसी भी ऐसे इंसान पे भरोसा मत करो जिसके टेलीविजन का आकार, उसके किताब के शेल्फ से बड़े हो "                                                                       -लेमोनी स्निकेट
कहते है किताबे इंसान के सच्चे दोस्त होते है, जो हर परिस्थिति में इंसान के साथ खड़े होते हैI  किताबों से किसी के व्यक्तित्व को आसानी से समझा सकता है I मैं अगर अपनी बात करू तो अगर किसी के घर गया और मुझे उसकी पास एक अच्छी पुस्तकालय दिख गया तो, उस व्यक्ति के लिए मेरे दिल में सम्मान स्वत जागृत हो जाती है I क्योकि इस बात की पूरी सम्भावना है कि वह इंसान काफी समझदार और सुलझा हुआ है, एक अच्छा ज्ञानी और दार्शनिक है I किताबों का इतिहास मानव सभ्यता जितना ही पुराना है I सृष्टि निर्माण के समय इंसान को अन्य जीवो से अलग इसीलिए रखा गया, क्योकि इंसान के पास सोचने और समझने की क्षमता होती है I प्राचीन समय में ज्ञान प्राप्ति का एक मात्र साधन किताबे ही हुआ करती थी I लेकिन तकनिकी विकास के साथ ज्ञान के अन्य साधन भी विकसित हुए जैसे टेलीविजन, रेडियो, इंटरनेट इत्यादि लेकिन आज भी ज्ञान प्राप्ति का सबसे विश्वसनीय श्रोत किताबे ही है I चाहे कितना भी तकनीकी विकास कर ले किताबों की जगह नहीं लिया जा सकता I हर एक महान व्यक्ति में एक गुण सामान मिलेगा वह है, किताब के प्रति उनका लगाव I वैसे अच्छी किताबों की सूचि बनाना आसान नहीं है, क्योकि हर एक किताब कुछ ना कुछ विशेषता लिए हुए होती है I लेकिन मैंने अब तक जितने किताबे पढ़ी है, उनमे से कुछ ऐसी किताबे है जो दिल को छू गई और मुझे लगता है प्रत्येक इंसान को यह किताबे जीवन में अवश्य पढ़नी चाहिए I

  1. गीता (Bhagvadgita)- भगवद्गीता महाभारत के युद्ध के समय अर्जुन को दिए गए उपदेशो और शिक्षाओं का संकलन है, जिसको महर्षि वेद व्यास ने संकलित किया था I आज तक मैंने जितनी भी किताबें पढ़ी है, गीता उन सब में सबसे ज्ञानपूर्ण और रोचक लगी I जिंदगी की सच्चाई को बयान करती, यह किताब आपके अंदर इतना ऊर्जा भर देती है कि आप कुछ भी हासिल कर सकते है, अगर इसके शिक्षाओं का ईमानदारी से पालन किया I इंसान की ज़िंदगी ऐसी समस्या नहीं जिसका हल गीता में न हो I इस किताब को पढ़ने के बाद ज़िन्दगी को जीने का आपका नज़रिया बदल जायेगा I इस किताब के सबसे अच्छी बात है कि इस किताब का अनुवाद दुनिया के सभी महत्वपूर्ण भाषाओ में किया जा चूका है I हज़ारो वर्ष पहले लिखी गई यह किताब आज भी उतनी ही व्यावहारिक है I अगर आपने अभी तक गीता नहीं पढ़ा है तो मैं जरूर बोलूंगा कि इसे एक बार अवश्य पढ़े ज़िन्दगी में सकारात्मक परिवर्तन जरूर देखने को मिलेगा I
  2. अर्थशास्त्र (Arthshastra)- 350 ईस्वी पूर्व लिखी गई यह किताब राजनीति पर लिखी गई पहली और अब तक की श्रेश्ठतम किताब मानी जाती है I हज़ारो साल पहले लिखी गई इस किताब के हर एक वाक्य आज के परिदृश्य में भी व्यावहारिक है I आचार्य कौटिल्य जिन्हे विष्णु गुप्त या चाणक्य के नाम से भी जाना जाता है के द्वारा लिखित यह किताब वैसे तो शासन व्यस्था चलाने से सम्बंधित है I लेकिन दैनिक जीवन के लिए भी यह काफी उपयोगी है I चाणक्य एक महान दार्शनिक और विद्वान थे जिन्होंने अपनी असाधारण प्रतिभा से एक साधारण से लड़के को भारत का चक्रवर्ती सम्राट बना दिया I जीवन जीने की कला सिखाने वाली यह किताब एक बार अवश्य पढ़नी चाहिए I
  3. इन्फ्लुएंस : द साइकोलॉजी ऑफ़ पर्सुएशन (Influence - The psychology of persuasion) - हर एक इंसान चाहता है कि वह अपने व्यव्हार से दुसरो को प्रभावित कर सके I लेकिन एक प्रभावी व्यक्तित्व कैसे प्राप्त करे, वह कौन कौन से बाते है जो एक व्यक्ति को अलग पहचान दिलाती है, कैसे एक अच्छा बॉस चुने, कैसे एक अच्छा लव पार्टनर चुने, कैसे किसी व्यक्ति के स्वाभाव के बारे में जाने इन सभी सवालो के जवाब इस किताब में मिल जायेंगे I सरल और सीधे शब्दों में मानवीय व्यहारो का अध्ययन इस किताब में किया गया है I रोबर्ट किएल्डिनी द्वारा लिखित यह किताब मनोविज्ञान की कुछ अच्छी किताबो में से मानी जाती है I
     
  4. थिंक एंड ग्रो रिच (Think and Grow Rich)-  नेपोलियन हिल द्वारा लिखित यह किताब दुनिया की सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबो में से एक है यह किताब 1940 के आसपास अमेरिका के 500 सफल लोगो की आदतों का विस्तृत अध्ययन है I 25 वर्षो के अवलोकन और अध्ययन के बाद नेपोलियन हिल  ने यह किताब लिखी I हिल के अनुसार इंसान जिस तरह की सोच रखता है, वही उसको मिलता है I सिर्फ एक सोच ही है जो सफल इंसान को असफल इंसान से अलग बनाती  है I इस किताब में सफल इंसानो की कुछ आदतों का भी जिक्र हिल ने किया है I इस किताब की  सबसे बड़ी विशेषता है इसकी व्यवहारिकता, क्योकि यह सफल लोगो के आदतों का व्यावहारिक अध्ययन है I
  5. जीत आपकी (You can win)- शिव खेड़ा द्वारा लिखी गई यह किताब मोटिवेशन के ऊपर लिखी गई कुछ अच्छी किताबो में से एक है I बेस्ट सेलर रही यह किताब काफी सरल और स्पष्ट भाषा में लिखी गई है I इस  किताब के अनुसार हर एक इंसान  ऊर्जा का असीमित स्रोत है बस जरुरत है उसको पहचानने की I  हिंदी और इंग्लिश साहिर सभी भारतीय भाषाओ में उपलब्ध यह किताब पढ़नी चाहिए I
  6. रिच डैड पुअर डैड ( Rich Dad Poor Dad)- बचत की आदत और निवेश के ऊपर लिखी गई यह किताब  दुनिया भर में सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबो में से एक है I इस किताब में दो तरह के लोगो के व्यव्हार का अध्ययन किया गया है अमीर और गरीब I दोनों ही तरह के लोगो की सोच और आदतों का तूलनात्मक अध्ययन किया गया है I लेखक के अनुसार हमें सबसे पहले चूहे की दौड़ (Rat race) से बाहर आना होगा जो तभी संभव है, जब हम वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर (Financial freedom) हो I वित्तीय आत्मनिर्भरता (Financial freedom) प्राप्त करने के लिए आपका वित्तीय रूप से शिक्षित (Financial literate) होना जरुरी है I  बचत और निवेश से सम्बंधित यह किताब हर एक इंसान को जरूर पढ़नी चाहिए I अमेरिकी लेखक और व्यवसायी रोबर्ट कियोसोकि द्वारा लिखित यह किताब  हिंदी और इंग्लिश समेत काफी भाषाओ में उपलब्ध है I
  7. लज्जा (Shame )- मानवीय संवेदनाओ और नारी संघर्ष पर आधारित यह किताब 1993 में बंगला में प्रकाशित हुई थी, और बाद में हिंदी और इंग्लिश समेत कई भाषाओ में इसका अनुवाद किया गया I बांग्ला देश में माइनॉरिटीज के विरुद्ध हिंसा और आगजनी को आधार लेके लिखी गई, यह किताब बांग्लादेश से  निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन द्वारा लिखी गई है I किताब प्रकाशित होने के 6 महीने के अंदर इसके 50,000 प्रतियां बिक चुकी थी I  बाद में इस किताब पर बांग्लादेश सरकार द्वारा प्रतिबन्ध लगा दिया गया और अभी भी बांग्लादेश में यह प्रतिबंधित है I इस किताब की लोकप्रियता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि फ्रेंच, जर्मन,इंग्लिश, इटालियन, स्वीडिश, पंजाबी, सिंघली, मलयालम, कन्नड़, तेलगु, तमिल, उर्दू  सहित 20 से ज्यादा देसी-विदेशी भाषाओ में अब तक इसका अनुवाद किया जा चूका है I इस किताब के बाद ही तस्लीमा नसरीन के खिलाफ बांग्ला देश में मौत का फतवा जारी किया गया था अभी तस्लीमा नसरीन भारत में शरण ली हुई है I
  8. अन्ना केरेनिना (Anna Karenina)- महान रुसी लेखक लियो टॉलस्टॉय द्वारा लिखी गई यह किताब विश्व साहित्य के इतिहास में लिखी गई कुछ बेहतरीन किताबो में से एक मानी जाती है I यह पूरा उपन्यास दो हिस्से में  प्रकाशित हुआ था I 1978 में पहली बार इसे रुसी भाषा में प्रकाशित किया गया था और इसका दुनिया के सभी महत्वपूर्ण भाषाओ में अनुवाद किया जा चूका है I रुसी सभ्यता, सामाजिक संघर्ष, वैवाहिक जीवन, स्त्री-पुरुष संघर्ष, मानवीय संवेदना को दर्शाती यह उपन्यास दिल को छू जाती है 800 से ज्यादा पेजो की यह उपन्यास अंत तक पाठको को बांधे रखती है I
  9. गोदान ( Gift of a cow)- हिंदी साहित्य में सबसे बड़े नाम और उपन्यास सम्राट के नाम से प्रसिद्द मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखी गई इस किताब को विश्व साहित्य के इतिहास के कुछ बेहतरीन किताबो में से माना जाता है I साल 1936 में प्रकाशित इस उपन्यास का कई विदेशी लेखकों द्वारा अनुवाद किया जा चूका है I रूढ़िवादी भारतीय समाज और परम्पराओ को दर्शाती यह उपन्यास विश्व साहित्य का प्रमुख धरोहर है I इस उपन्यास पर एक फिल्म भी बन चुकी है, इसके अलावा गुलज़ार द्वारा निर्देशित धारावाहिक तहरीर भी इसी से प्रभावित है I
     
  10. अग्नि की उड़ान (Wings of fire)- अग्नि की उड़ान पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ. ऐ. पी. जे. अब्दुल कलाम की आत्मकथा है I एक छोटे से गांव के गरीब परिवार से निकलकर भारत के राष्ट्रपति   बनने तक का पूरा सफर और उस दौर के संघर्षो की कहानी को इस आत्मकथा में दर्शाया गया हैI  हिंदी और  इंग्लिश दोनों ही भाषाओ  उपलब्ध इस किताब को हर एक युवा को पढ़नी चाहिए I