Tuesday, February 26, 2019

भारतीय ज़िनकी ज़िद ने असंभव को संभव कर दिया


मंज़िले उन्ही को मिलती है जिनके सपनो में जान होती है, पंखो से कुछ नहीं होता हौसला से उड़ान होती है I  

  1. अटल बिहारी बाजपेयी : अटल बिहारी बाजपेयी का नाम आते ही जेहन में एक ऐसे व्यक्तित्व का चेहरा उभर जाता है, जिन्होंने सफलता की नयी परिभाषा लिखी I भारतीय राजनीति में अपनी अलग पहचान रखने वाले अटल जी का 65 सालो का राजीनीतिक सफर काफी उतार - चढाव वाला रहा I  सफलता की उचाईयो को छूने वाले अटल जी का जीवन काफी संघर्षो वाला रहा I लेकिन स्वभाव से भी 'ज़िद्दी और अटल' बाजपेयी ने हर एक असफलता को न सिर्फ स्वीकारा बल्कि उसका आनंद लिया I अटल जी ने जब श्यामा प्रसाद मुख़र्जी और दीन दयाल उपाध्याय  के सपनो को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया, तो किसी ने भी उनको गंभीरता से नहीं लिया I किसी ने सोचा भी नहीं था कि 2 लोगो की पार्टी कभी दुनिया कि सबसे बड़ी राजनीतिक दल बन जाएगी  I लेकिन यह बाजपेयी का व्यक्तित्व था जो बार-बार हारने और गिरने के बाद भी अटल रहे I क्योकि उन्हें पता था यह असफलता उस मंज़िल की सीढ़ी है जहाँ पहुंचने के लिए उन्होंने सफर की शुरुआत की थी I 
  2. किशोर कुमार : भारतीय संगीत की बात हो और किशोर कुमार का नाम ना आये, ऐसा संभव नहीं I भारतीय फिल्म इतिहास में पुरुष गायन में जो मुकाम किशोर दा ने हासिल किया वह शायद ही किसी और को नसीब हो I 1960 से 1985 का दौर किशोर कुमार के नाम रहा I इस दौरान उन्होंने हज़ारो सुपरहिट गाने दिए और दोनों सुपर स्टार्स राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की आवाज़ बन गए I लगातार 6 फिल्म फेयर अवार्ड और वह सब कुछ जो एक कलाकार के लिए सपना होता है I लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने के लिए किशोर कुमार को बहुत संघर्ष करना पड़ा I उनके शास्त्रीय संगीत का ज्ञान ना होने की वजह से कोई भी उनको काम देने के तैयार नहीं था I लेकिन किशोर कुमार की ज़िद थी एक सफल गायक बनने की और उन्होंने वह कर दिखाया I इतने महान गायक के लिए एक समय ऐसा भी रहा जब एक गाने के लिए उन्हें कोई लेने को तैयार नहीं था I लेकिन किशोर ने साबित कर दिया, अगर हौसला हो तो सब कुछ संभव है I पढ़ना जारी रखे ---
  3. जयप्रकाश नारायण : आज़ादी के बाद भारत में कांग्रेस के अलावा किसी और की सरकार बन सकती है ऐसा मज़ाक से ज्यादा कुछ नहीं था  I लेकिन यह असंभव काम कर दिखाया जयप्रकाश नारायण ने I भारतीय राजनीति में  परिवर्तन और त्याग की बात जब भी की जाती है जयप्रकाश  नारायण का नाम सबसे ऊपर आता है I जब 1975 में जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गाँधी की सत्ता को उखाड़ फेकने का संकल्प लिया I किसी ने सोचा भी नहीं था ऐसा हो सकता है, लेकिन जयप्रकाश नारायण ने ना सिर्फ इसे संभव किया I बल्कि खुद इंदिरा गाँधी को हार का सामना करना पड़ा I यह अपने आप में एक करिश्मा से काम नहीं था I हालाँकि इंदिरा गाँधी को उखाड़ फेंकने के लिए जयप्रकाश नारायण को काफी कुछ सहना पड़ा I लेकिन ज़िद थी सत्ता परिवर्तन की और उसे कर दिखाया I पढ़ना जारी रखे..
  4. मेजर ध्यानचंद : एक ऐसा खिलाडी जिसका भारतीय टीम में रहना मतलब जीत की गारंटी, जी है बात कर रहे है विश्व हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की I हॉकी के इतिहास में जो शोहरत ध्यानचंद ने हासिल की वह तक जाना किसी भी खिलाडी के लिए सपना मात्र है I यहाँ तक की जर्मनी के तानाशाह अडोल्फ हिटलर को ध्यानचंद के सामने नतमस्तक होना पड़ा I यह वाक्या है बर्लिन ओलिंपिक की जब भारतीय टीम ने जर्मनी को 16-1 से हराया I जिसमे 15 गोल अकेले ध्यानचंद ने किया था I मैच के बाद पहले तो हिटलर ने ध्यानचंद का स्टिक तोड़वाया I क्योकि उसे लग रहा था स्टिक में कुछ ऐसा है जो बॉल को आकर्षित कर लेता है लेकिन ऐसा कुछ नहीं निकला  I फिर हिटलर ने ध्यान चाँद को जर्मन आर्मी में अच्छा पोस्ट और पैसे की पेशकश  की I लेकिन ध्यानचंद ने मन कर दिया, ऐसा हिम्मत सिर्फ ध्यानचंद ही दिखा सकते थे I एक ज़िद थी ध्यानचंद की भारत को ओलिंपिक में गोल्ड मैडल दिलाने की और विश्व चैंपियन बनाने की और कर दिखाया I मेजर ध्यानचंद की अगुवाई में भारत ने लगातार बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए ओलिंपिक में लगातार अपना वर्चस्व रखते हुए गोल्ड जीता I
  5. लाल बहादुर शास्त्री : लाल बहादुर शास्त्री एक छोटे कद का इंसान और इसी छोटे कद से धोखा खाकर पाकिस्तान ने भारत पे आक्रमण कर दिया I लेकिन इस छोटे कद के इंसान ने पाकिस्तान को धूल चटाकर साबित कर दिया, युद्ध जीतने के लिए साइज नहीं ज़िद की जरुरत होती है I एक छोटे से गांव के गरीब परिवार से निकल कर भारत के प्रधानमंत्री बनने तक का सफर इतना आसान नहीं था I लेकिन इसे संभव कर दिखाया शास्त्री जी ने जब उनके नेतृत्व में भारतीय सेना ने  1965 के भारत पाक युद्ध में पाकिस्तान को लाहौर तक खदेड़ दिया था I  पाकिस्तान सेना के प्रमुख अयूब खान ने मीडिया के सामने स्वीकार किया था I शास्त्री जी के छोटी हाइट और सादगी से हमें यह लगा कि वह कमजोर प्रधानमंत्री है और यही समय है आक्रमण का और यह भूल पाकिस्तान के लिए घातक सिद्ध हुई I

Saturday, February 23, 2019

टाइटैनिक के बारे में 10 अनोखे तथ्य


1. टाइटैनिक पर क्षमता से काफी कम जीवन रक्षक बोट रखे गए थे I 3,550 लोगो के क्षमता वाले इस जहाज पर जितने बोट रखे गए थे उससे सिर्फ 1,000 लोगो को ही बचाया जा सकता था I हालाँकि डूबते समय और भी कम लोगो को बचाया जा सका ऐसा इसलिए क्योकि बोट पूरी तरह से भरे नहीं गए I  टाइटैनिक पर क्षमता से काफी कम बोट रखने के दो प्रमुख कारण थे पहला टाइटैनिक बनाने वालो को पूरा विश्वास था कि यह जहाज डूब नहीं सकता और दूसरा ज्यादा बोट रखने से टाइटैनिक का लुक ख़राब हो जायेगा I
2. टाइटैनिक डूबने से 14 साल पहले ही एक अमेरिकी लेखक मॉर्गन रॉबर्ट्सन ने एक उपन्यास लिखा 'द रेक ऑफ़ द  टाइटन' I जिसकी कहानी और पात्र हूबहू टाइटैनिक से मिलते जुलते थे I रॉबर्ट्सन के उपन्यास में इंग्लैंड का एक विशालकाय जहाज अप्रैल के महीने में अटलांटिक महासागर में दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है और सभी यात्री मारे जाते है वास्तविक में भी यही हुआ यह अपने आप में एक बड़ा अचंभित करने वाला था I
3. टाइटैनिक का मतलब होता है विशालकाय दानव यह नाम इसलिए दिया गया था क्योकि टाइटैनिक काफी विशालकाय जहाज था जिसके डूबने की सम्भावना ही नहीं थी I 
4. टाइटैनिक में यात्रियों का मनोरंजन करने के लिए म्यूजिक बैंड रखा गया था जिसमे कुल मिलाकर 7 लोग थे I जब टाइटैनिक डूबने लगा तो यात्रियों में भगदड़ मचने लगा I भगदड़ को रोकने के लिए म्यूजिक बैंड ने म्यूजिक बजाना शुरू किया I लेकिन भगदड़ को रोक नहीं पाए फिर भी जहाज के पूरी तरह से डूबने तक म्यूजिक बजाते रहे I इन सभी की मृत्यु डूबकर हो गई थी, मरने के बाद में इन सातो लोगो को इंग्लैंड में हीरो की तरह सम्मान दिया गया I
5. टाइटैनिक के दुर्घटना के लिए जहाज के कप्तान स्मिथ को सीधे तौर पे जिम्मेदार ठहराया गया I क्योकि स्मिथ ने टाइटैनिक के स्पीड को तेज कर दिया था और टकराने से पहले स्पीड कम भी नहीं किया इसके अलावा स्मिथ को दिशाओ की सही जानकारी नहीं थी I
6. टाइटैनिक का निर्माण उच्च वर्ग को ध्यान में रखकर ही किया गया था I यही कारण है इस वर्ग का खास  ध्यान रखा गया था स्विमिंग पूल, बार, सिगरेट पीने के लिए अलग से केबिन, संगीत से लेके हर तरह की व्यवस्था किया गया था I यहाँ तक की क्षमता से काफी कम जीवन रक्षक बोट रखने का निर्णय भी इसी लिए लिया गया था ताकि इस वर्ग को घूमने फिरने में कोई तकलीफ न हो, जो काफी खतरनाक साबित हुई I
7. जिस टाइटैनिक को कभी न डूबने वाला जहाज माना जाता था I वह अपने पहले ही यात्रा में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था I अपने पहले सफर में टाइटैनिक इंग्लैंड के सॉउथम्पटन शहर से अमेरिका के न्यूयोर्क शहर के लिए निकला था I जब यह अटलांटिक महासागर में आइसबर्ग से टकराकर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था I
8. सरकारी आंकड़े के अनुसार टाइटैनिक डूबने से करीब 1,700 लोगो की मौत हुई थी मरने वालो में ज्यादातर पुरुष यात्री थे I क्योकि महिलाओ और बच्चो को काफी हद तक लाइफ बोट से रवाना कर दिया गया था I
9. टाइटैनिक का फर्स्ट क्लास का किराया करीब 1,10,000 डॉलर था जबकि थर्ड क्लास का किराया करीब 140 डॉलर और यही कारण है कि थर्ड क्लास की सुविधा का बिलकुल भी ध्यान नहीं रखा गया था I
10. उच्च वर्ग में यात्रा करने वाले ज्यादातर लोग व्यवसायी थे, जबकि थर्ड क्लास में ज्यादातर प्रवासी थे जो अपनी आजीविका के लिए न्यूयोर्क जा रहे थे I

पिछले 50 सालो से निरमा के पैकेट पे दिखने वाली लड़की कौन है ?

भारतीय विज्ञापन इतिहास में कुछ ऐसे विज्ञापन है जो बहुत लोकप्रिय हुए I निरमा वाशिंग पाउडर का विज्ञापन भी इतिहास के उन चुनिंदा विज्ञापनों में से है, जिसने लोकप्रियता के शिखर को छुआ I निरमा के विज्ञापन में सबसे  गौर करने वालों बात है निरमा के पैकेट पे पिछले 50 सालो से एक ही लड़की की फोटो है, जो निरमा का पहचान बन गयी I इससे पहले उस लड़की के बारे में  बात करे I जानते है निरमा के शुरुआत की दिलचस्प कहानी I
                          दरअसल निरमा के शुरुआत की कहानी भी काफी दिलचस्प है I निरमा की शुरुआत करसन भाई पटेल ने की थी I करसन भाई पटेल गुजरात सरकार के सरकारी मुलाजिम थे I सरकारी नौकरी के अलावा करसन भाई ने घर से ही वाशिंग पाउडर बनाने का काम शुरू किया और खुद ही काम पे साइकिल से जाते समय बेचा करते थे I उस समय वाशिंग पाउडर महंगा होने के कारण माध्यम वर्ग और निम्न वर्ग के पहुंच से बाहर था I 1969 में जब निरमा की शुरुआत हुई उस समय वाशिंग पाउडर 14 रूपये किलो के हिसाब से मिलता था I जो काफी महंगा था I वाशिंग पाउडर बाजार में हिंदुस्तान यूनिलीवर का वर्चस्व था I करसन भाई ने निरमा को करीब 3 से 4 रूपये के हिसाब से बेचना शुरू किया I इस तरह से आस पास के बाज़ारो में निरमा की मांग बढ़ गई I मांग बढ़ने के साथ करसन  भाई ने केमिस्ट की नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह से निरमा के उत्पादन और वितरण में लग गए I इसके लिए स्थानीय क्षेत्रो के वितरकों को निरमा वाशिंग पाउडर उधार पे देना शुरू किया I लेकिन उधार की वसूली न हो पाने की वजह से निरमा को नुकसान होने लगा I फिर करसन  भाई ने टीवी पे विज्ञापन का सहारा लिया I टीवी पर यह विज्ञापन काफी लोकप्रिय हुआ और इस तरह से निरमा की मांग तेजी से बढ़ने लगी I बढ़ी हुई मांग को पूरा करने के लिए मज़बूरी में वितरकों को नकद पे मॉल उठाना पड़ा I धीरे- धीरे निरमा पुरे हिंदुस्तान में वाशिंग पाउडर में एक बड़ा नाम बन गया और तेजी से इसकी बाजार हिस्सेदारी बढ़ने लगी I आज वाशिंग पाउडर बाजार में निरमा की हिस्सेदारी करीब 30 % है और इसने हिंदुस्तान यूनिलीवर जैसी कम्पनीज को कड़ी टक्कर देते हुए अपनी जगह बाजार में बनायीं I एक घर से शुरू होकर 50,000 करोड़ रूपये के टर्नओवर तक पहुचने वाली यह कंपनी आज उपभोक्ता बाजार में अपनी मज़बूत पकड़ बना चुकी है I
निरमा को एक ब्रांड नाम बनाने में उसके विज्ञापन का बहुत बड़ा रोल रहा और उस विज्ञापन को लोकप्रिय बनाने उस लड़की का जिसकी फोटो निरमा की पहचान बन गई I निरमा को सफलता के शिखर पे पहुंचाने में उस लड़की की फोटो का बहुत बड़ा योगदान है I पिछले 50 सालो से निरमा की पहचान बनी यह लड़की निरमा के सफलता की गवाह है I आखिर निरमा के पैकेट पे पिछले 50 सालो से दिखने वाली लड़की कौन है और अब कैसी दिखती है I
दरअसल निरमा के विज्ञापन में और पैकेट पे दिखने वाली लड़की का नाम निरुपमा है, जो करसन भाई पटेल  की बेटी थी I निरुपमा को घर वाले प्यार से निरमा बुलाते थे I लेकिन बचपन में ही सड़क हादसे में उसकी मृत्यु हो गई थी I उसकी मृत्यु से करसन भाई पटेल काफी दुखी हुए और उसके नाम को अमर बनाने की  ठान ली I  और इसी जिद ने जन्म दिया को भारत के एक बड़े ब्रांड नाम निरमा को I आज भी यह लड़की निरमा की पहचान है I

Thursday, February 14, 2019

मैक्डोनाल्ड के सफलता की कहानी



" पागलपन ही जूनून कि हद को बढाती है , वरना शांत लहरे क्या कभी तूफ़ान लाती है ' I
'मैक्डोनाल्ड' यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है  I दुनिया की अग्रणी फ़ास्ट फ़ूड फर्म मैक्डोनाल्ड के आज 37,000 से ज्यादा रेस्टोरेंट दुनिया के 100 से ज्यादा देशो में अपनी सेवाएं दे रहे है I वालमार्ट के बाद दुनिया की सबसे ज्यादा रोज़गार देने वाली कंपनी है I मुख्य रूप से इस रेस्टोरेंट की पहचान इसके बर्गर की वजह से है, हालाँकि इसके अलावा भी बहुत सारे खाने-पिने  के सामान यहाँ मिल जाते है I  इतनी बड़ी कंपनी की शुरुआत कैलिफ़ोर्निया के एक छोटे से रेस्टोरेंट से हुई थी I जिसकी नीव 1940 में दो भाइयो रिचर्ड मैक्डोनाल्ड और मौरिस मैक्डोनाल्ड ने रखी थी I 1940 से लेकर 1955  तक इन दोनो भाइयो ने इस रेस्टोरेंट का संचालन किया  I इस रेस्टोरंट की सबसे बड़ी विशेषता इसका 'स्पीडी सिस्टम ' था I आज भी मैक्डोनाल्ड की सबसे बड़ी विशेषता इसका 'स्पीडी सिस्टम' ही है
                               इसके स्पीडी सिस्टम से प्रभावित होकर 1955 में रे क्रूक एक फ्रैंचाइज़ी के जरिये  इस कंपनी से जुड़ गए I रे क्रूक काफी महत्वाकांक्षी इंसान थे और वह चाहते थे की इस रेस्टोरेंट की पुरे दुनिया में फ्रैंचाइज़ी हो और इसको एक वैश्विक पहचान मिल जाये I  लेकिन दोनों भाई रिचर्ड मैक्डोनाल्ड और मौरिस मैक्डोनाल्ड रे की इस बात से सहमत नहीं थे I मैक्डोनाल्ड की पहचान उसके गुणवत्ता की वजह से था और दोनों भाई रिचर्ड मैक्डोनाल्ड और मौरिस मैक्डोनाल्ड नहीं चाहते थे कि इसकी गुणवत्ता से कोई समझौता हो इसलिए दोनों भाइयो ने फ्रैंचाइज़ी के जरिये विस्तार योजना को सिरे से मन कर दिया I
                                 महत्वाकांक्षी और आक्रामक रुख वाले रे क्रूक ने कुछ ही समय में इस कंपनी में अपने पूरा प्रभाव बना लिया I  रे ने करीब 56 साल की उम्र में मैक्डोनाल्ड ज्वाइन किया था  I इसके पहले रे ने बहुत सारे व्यसायो में किस्मत आजमाया लेकिन हर जगह सिर्फ निराशा ही हाथ लगी I यहाँ तक रे को अपने एकमात्र घर गिरवी रखना  पड़ा मैक्डोनाल्ड की फ्रैंचाइज़ी लेने के लिए, लेकिन रे ने कभी हार नहीं मानी  I कहते है कि किस्मत भी उसी का साथ देती है जो हार नहीं मानता  I रे का मानना था कि सफल होने के लिए एक मात्र चीज़ जो जरुरी है वह है 'ज़िद'  I इस 'ज़िद' के आगे सफलता को नतमस्तक होना ही पड़ता है रे ने संघर्ष करते हुए अपनी ज़िद के दम पर मैक्डोनाल्ड को उचाईयो पे पंहुचा दिया I
                              रे को लगने लगा कि दोनों भाइयो के रहते हुए मैक्डोनाल्ड को वैश्विक रूप नहीं दिया जा सकता I अब इस कंपनी को वैश्विक रूप देने का एक मात्र उपाय यही था कि इस कंपनी को खरीद लिया जाये I लेकिन रे कि आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह अभी इसको खरीद सके और दूसरी सबसे बड़ी समस्या यह थी कि दोनों भाई रिचर्ड मैक्डोनाल्ड और मौरिस मैक्डोनाल्ड इस बात के लिए तैयार भी नहीं थे I लेकिन महत्तवाकांक्षी रे को किसी भी कीमत पे मक्डोनल्ड चाहिए था  I इसके लिए रे ने निवेशकों को आमंत्रित किया और अपने विस्तार योजना को उनके सामने रखा I  निवेशकों को रे का विचार काफी पसंद आया और इस तरह रे को निवेशक मिल गए I निवेशकों से निवेश मिलने के बाद रे ने कंपनी के मूलभूत सिद्धांतो में कुछ बदलाव किया जो दोनों भाइयो को नागवार गुजरी दोनों भाइयो ने कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने के के लिए क्रूक रे को कोर्ट ले जाने कि धमकी दी I लेकिन रे ने ठान लिया था मैक्डोनाल्ड को वैश्विक पहचान देने का और इसके लिए वह हर कीमत देने को तैयार थे I निवेशकों के मिलने के बाद रे ने मैक्डोनाल्ड के संस्थापक दोनों भाइयो रिचर्ड मैक्डोनाल्ड और मौरिस मैक्डोनाल्ड को एक बड़ा ऑफर दिया  I मक्डोनल्ड को खरीदने के बदले, जो शायद दोनों भाइयो ने सोचा भी नहीं था और आखिरकर रे ने मैक्डोनाल्ड को खरीद लिया दोनों भाइयो से उसके बाद रे ने कभी पीछे मुड़के नहीं देखा I
                              दुनिया की सबसे बड़ी आय अर्जित करने वाली रेस्टोरेंट श्रृंखला मैक्डोनाल्ड को खड़ा करने के पीछे एक इंसान की ज़िद थी I जिसने उम्र के उस पड़ाव पे इसकी शुरुआत की जब इंसान रिटायरमेंट लेता है यह मिसाल है उन लोगो के लिए जो परिस्थितियों को दोष देते है अपनी विफलता के लिए I 

बाज़ का जीवन चक्र

" मुझे अपने हर एक मिनट के प्रशिक्षण से घृणा होती थी लेकिन मैंने सोच रखा था , अभी मुझे यह दर्द सहना है ताकि पूरी ज़िन्दगी चैंपियन की तरह गुजर सकूँ " I
              - मोहम्मद अली
बाज़ जो अपने अचूक निशाने और एकाग्रता के लिए जाना जाता है I शिकार को भेदने में उसके नुकीले चोंच और फड़फड़ाती पंखो का बहुत बड़ा योगदान होता है I एशिया, अमेरिका और यूरोप महाद्वीप में पाया जाने वाला यह पक्षी अपने शिकार को पलक झपकते ही उसके अंजाम तक पंहुचा देता है I यह हमें बताता है कि अगर लक्ष्य प्राप्त करना है तो उसके लिए अपने को पूरी तरह से समर्पित कर दो लक्ष्य अवश्य प्राप्त होगा I लेकिन इंसान की तरह उसके ज़िन्दगी में भी एक ऐसा समय आता है,  जब उसे कठिन परीक्षा के दौर से गुजरना पड़ता है I बाज़ की औसत उम्र करीब 70 वर्ष होती है I लेकिन 40 साल के बाद उसके नुकीले चोंच धारहीन हो जाते है और वह शिकार करने लायक नहीं रह जाते I इसके अलावा उसके तेज पंख बेजान और भारी हो जाते है और वह उड़ने लायक नहीं रह जाते I अब उसके पास सिर्फ दो विकल्प होता है पहला या तो वह भूख और प्यास से अपनी जान दे और दूसरा अपने चोंच और पंख को तोड़ दे I दूसरा विकल्प काफी कठिन और कष्टदायी होता है लेकिन बाज़ हमेशा दूसरे विकल्प को चुनता है I वह किसी पहाड़ी की ऊँची चोटी पर जाकर अपना घोसला बनाता है फिर किसी नुकीले पत्थर से रगड़कर अपने पुराने धारहीन चोंच को तोड़ता है और फिर नए चोंच आने का इंतज़ार करता है I एक बार नए चोंच आ जाने के बाद फिर अपने भारी पंखो को तोड़ता है और नए पंख आने का इंतज़ार करता है I यह पूरी प्रक्रिया काफी समय लेने वाली होती है और इस दौरान बाज़ अपने को सुरक्षित  रखता है I इस पुरे प्रक्रिया में उसे काफी दर्द और मुश्किलों  का सामना करना पड़ता है I लेकिन इस पुरे प्रक्रिया से गुजरने के बाद जो नए चोंच और पंख आते है वह बाज़ को नई ज़िन्दगी देते है I बाज़ पहले जैसा ऊँची उड़ान भरने और शिकार को भेदने की अचूक क्षमता वाला बन जाता है I बाज़ का यह जीवन चक्र काफी प्रेरित करने वाला है I हमें भी अगर अपने को तेज़ और अचूक बनाये रखना है और साथ साथ ऊँची उड़ान भरनी है I तो हमें भी बाज़ की तरह दूसरे विकल्प का चुनाव करना पड़ेगा I ज़िन्दगी में आगे बढ़ने और सफल होने के लिए कठिन परीक्षाओ से गुजरना ही पड़ेगा I 

Wednesday, February 13, 2019

Madan Mohan Malviya ( मदन मोहन मालवीय )

 " जो व्यक्ति अपनी निंदा सुन लेता है वह सारे जगत पर विजय प्राप्त कर सकता है " I                                                   - मदन मोहन मालवीय संक्षिप्त परिचय:जन्म : 25  दिसंबर , 1861 (प्रयाग ) भारत मृत्यु: 12 नवंबर, 1946 (प्रयाग) भारत माता-पिता : पंडित बैजनाथ मालवीय, मूना देवी शिक्षा : कलकत्ता विश्वविद्यालय, प्रयाग  विश्वविद्यालयकार्यक्षेत्र : शिक्षा, धर्म, राजनिति, पत्रकारिता, स्वंतंत्रता संग्राम, वकालत सम्मान: भारत रत्न ( मरणोपरांत )प्रारंभिक जीवन :पंडित मदन मोहन मालवीय का जन्म उत्तर प्रदेश के प्रयाग में 18 दिसंबर 1861 को एक धार्मिक ब्राह्मण परिवार में हुआ था I इनके पिता पंडित ब्रजनाथ मालवीय संस्कृत के काफी बड़े विद्वान थे और शास्त्र विद्या में निपुण थे I पूरा परिवार काफी धार्मिक था, जिसका काफी बड़ा प्रभाव पंडित मालवीय पे भी पड़ा I इनकी प्रारंभिक शिक्षा वहां  के सरकारी स्कूल से हुई और उच्च शिक्षा के लिए इन्होने प्रयाग विश्वविद्यालय  और कलकत्ता विश्वविद्यालय का रुख किया और स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की I पत्रकारिता  :मालवीय जी ने अपने कैरियर की शुरुआत एक अध्यापक के रूप में की थी I लेकिन बाद में पत्रकारिता से जुड़ गए और पत्रकारिता में अलग पहचान बनाई I मालवीय जी ने प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र 'हिंदुस्तान टाइम्स' में पूरा स्वामित्व बिरला समूह से खरीद लिया और 1924 से 1946 तक इसके अध्यक्ष बने I रहे बाद में साप्ताहिक पत्र 'हिंदुस्तान' की शुरुआत की I उसके बाद अंग्रेजी और हिंदी के कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया जिनमे लीडर, द इंडियन ओपिनियन, हिंदी प्रदीप, अभ्युदय, धर्म प्रमुख रहे Iवकालत: वकालत की डिग्री लेने के बाद मालवीय जी ने इलाहबाद उच्च न्यायालय से वकालत का प्रैक्टिस आरम्भ किया और कुछ ही समय में उस दौर के प्रमुख वकीलों में इनका नाम आने लगा I मालवीय जी ने कभी भी पैसे के लिए वकालत नहीं किया I आज़ादी के दौरान कई क्रांतिकारियों के लिए बिना किसी शुल्क के केस लड़ा I चौरी चौरा कांड का गाँधी जी द्वारा विरोध करने के बावजूद मालवीय जी ने क्रांतिकारियों और अन्य आरोपी भारतीयों का केस मज़बूती से लड़ा और 170 में से 155 को रिहा करने में कामयाब रहे I यह काफी महत्वपूर्ण उपलब्धि रही और इसके बाद  मालवीय जी कद काफी बढ़ गया I राजनीतिक पारी:मालवीय जी ने अपने राजनीतिक पारी की शुरुआत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ किया था I कोंग्रेस के प्रमुख नेता दादा भाई नैरोजी मालवीय जी के विचारो से काफी प्रभावित हुए और उन्हें कांग्रेस में महत्वपूर्ण पद दिया I मालवीय जी चार बार (लाहौर 1909, दिल्ली 1918, दिल्ली 1932, कलकत्ता 1933) कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए I आज़ादी से पहले चार बार कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने वाले एकमात्र नेता थे I इसके अलावा मालवीय जी कांग्रेस द्वारा हिन्दुओ की उपेक्षा से काफी आहात थे और इसी के चलते वह हिन्दू महासभा से भी जुड़ गये I स्वंत्रतता संग्राम :पंडित मालवीय ने स्वंत्रतता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लिया, चाहे जहा एक तरफ अपने पत्र पत्रिकाओं से अंग्रेजी सरकार का खुलकर विरोध किया, वही दूसरी तरफ क्रांतिकारियों की तरफ से बिना किसी शुल्क के केस लड़ा I इसके अलावा अंग्रेजी सरकार के खिलाफ हो रहे आंदोलनों का नेतृत्व किया I चौरी चौरा कांड का गाँधी जी द्वारा विरोध करने के बावजूद मालवीय जी ने क्रांतिकारियों का पक्ष अदालत में मज़बूती से रखा, बल्कि 170 आरोपियो में से 155 की रिहाई कराइ I कांग्रेस में रहते हुए खिलाफत आंदोलन का मुखर विरोध किया और कांग्रेस की आलोचना की I इसके अलावा अम्बेडकर और अंग्रेजी हुकूमत के बीच हुए पूना पैक्ट का भी मुखर विरोध किया और इसी के विरोध में कांग्रेस छोड़कर नई पार्टी कांग्रेस नेशनलिस्ट पार्टी का गठन किया Iबनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी की स्थापना :मालवीय जी का सपना था, एक ऐसे शैक्षिक संस्थान के स्थापना का  जिसकी गुणवत्ता वैश्विक स्तर की हो लेकिन मूल्य भारतीय हो I इसी सपने को पूरा करने के लिए 15 सालो तक लगातार संघर्ष किया और अंतता १916 में बनारस हिन्दू विश्विद्यालय की स्थापना की गई, जो बाद में भारत में शिक्षा का मुख्य केंद्र बन गया I  वाराणसी में स्थापित किया गया यह विश्विद्यालय एशिया का सबसे बड़ा विश्विद्यालय ह, जो पूरी दुनिया में अपनी गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध है I आज भी इसको विद्वान पैदा करने का कारखाना कहा जाता है Iइसके अलाव सेंट्रल हिन्दू स्कूल और अन्य कई शैक्षिक संस्थाओ को शुरू करने में मालवीय जी का काफी बड़ा योगदान रहा I 
सामाजिक और धार्मिक कार्य :
मालवीय जी ने सामाजिक और धार्मिक कार्यो में भी काफी रूचि दिखाई I स्काउट को भारत में शुरू करने वाले लोगो में मालवीय जी भी थे I इसके अलावा धार्मिक परिवार से जुड़े होने के कारण इन्होने धर्म के प्रसार के लिए भी काफी योगदान दिया I धर्म के व्यापक प्रचार प्रसार के लिए धार्मिक पत्रिका धर्म की शुरुआत की Iसम्मान और उपलब्धि :कुछ व्यक्तिव्त्व ऐसे होते है जो सभी सम्मानों से ऊपर होते है, और मालवीय जी भी उन्ही में से थे I मालवीय जी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर रविंद्र नाथ टैगोर ने उन्हें 'महामना ' (सुपर ग्रेट) की उपाधि दी I 2014 में भारत सरकार द्वारा मालवीय जो को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न ' देने की घोषणा की Iमृत्यु : पंडित मदन मोहन मालवीय की मृत्यु 12 नवंबर 1946 (उत्तर प्रदेश )  को प्रयाग में हो गई I