Monday, March 4, 2019

90 के दशक की बचपन की यादें

" वो कागज़ की किश्ती वो बारिश का पानी, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन वह कागज़ की किश्ती वो बारिश का पानी ". 
ज़िन्दगी में कुछ ऐसी चीज़े है जिनको ख़रीदा नहीं जा सकता I बचपन भी उन्ही चीज़ो में से एक है  जिसकी कीमत नहीं लगाई जा सकती I हो सकता है आप बहुत अमीर बन जाये, लेकिन इतना अमीर कभी नहीं बन सकते कि आप बचपन को खरीद सके I बचपन में इंसान ना गरीब होता है ना ही अमीर, ना बेवकूफ होता है ना समझदार, ना हारने का गम ना जितने की ख़ुशी,ना कोई दोस्त ना कोई दुश्मन,ना हिन्दू होता है ना मुस्लिम, ना उसे पाप का डर होता है नहीं पुण्य की कामना  I बचपन में इंसान सिर्फ इंसान होता है I बचपन इंसान के जीवन का स्वर्णिम समय होता है I लेकिन यह बात उसे तब समझ आती है जब बचपन पीछे छूट जाता है I बचपन की कुछ यादें जो मेरे जेहन में हमेशा रहती है और ना सिर्फ मेरे बल्कि हर एक इंसान के लिए यह यादें बेशकीमती है I                                                                                                                                                   1.कॉमिक्स -

                                                                                     
1990 दशक के सुपर हीरो चाचा चौधरी, नागार्जुन और शक्तिमान को कैसे भुलाया जा सकता है I 90 के दशक में बच्चो के सुपर हीरो चाचा चौधरी, नागार्जुन, और शक्तिमान हुआ करते थे I गर्मियों की छुटियो में दोपहर के समय माँ जब मना कर देते थी , बाहर नहीं जाना है धुप बहुत तेज है I तो उस समय दोपहर में समय व्यतीत करने के लिए कॉमिक्स ही पढ़ा करते थे I उस समय नागार्जुन,चाचा चौधरी और शक्तिमान के कॉमिक्स के सीरीज आया करते थे I शाम होते ही दुकान जाके 50 पैसे देकर कॉमिक्स किराया पे लाया, पुरे दिन में उसे पढ़कर फिर शाम को वापिस कर देते थे I फिर शाम को कॉमिक्स का अगला सीरीज, यह पुरे साल चलता रहता था, कम से कम गर्मियों की छुटियो में तो प्रतिदिन की दिनचर्या थी I
2.ब्लैक एंड व्हाइट टीवी :
आज बच्चो को अगर ब्लैक एंड व्हाइट टीवी के बारे में बोले तो शायद विश्वास नहीं करेंगे I लेकिन 1990 के दशक के गवाह रहे लोगो को अच्छे से पता है कि उस समय मनोरंजन का सबसे प्रमुख साधन ब्लैक एंड व्हाइट टीवी हुआ करता था I मुझे अच्छे से याद है टेक्सला या ओनिडा का ब्लैक एंड व्हाइट टीवी जो बड़े से एंटीना से जुड़ा होता था, जो छतो पर लगे होते थे और जिसमे 12 चैनल हुआ करते थे जिसे बदलने के लिए पेचकस का प्रयोग करना पड़ता था I क्योकि उस समय रिमोट नहीं हुआ करता था लेकिन जितना क्रेज उस ब्लैक एंड व्हाइट टीवी का था आज LED का भी नहीं है I पहले टीवी का इंतज़ार रहता है, लेकिन अब साल बीत जाते है टीवी देखे बिना I
3. रेडियो - 
1990 में समाचार और मनोरंजन का सबसे विश्वश्नीय साधन रेडियो ही हुआ करता था I उस समय फिलिप्स और मर्फी ब्रांड का सेल वाला रेडियो आता था I विविध भारती के मनोरंजन के कार्यक्रम और बीबीसी लंदन के देश- विदेश के समाचार का जो मज़ा और क्रेज था शायद, अब वो क्रेज किसी भी कार्यक्रम के लिए नहीं रहा I हालाँकि रेडियो का क्रेज आज भी ग्रामीण इलाको में देखा जा सकता है I


4. गुल्लक - 
ज़िन्दगी में इंसान को तीन चीज़े एक साथ कभी नहीं मिलती पैसा, ऊर्जा, समय I बचपन वह दौर है जब इंसान के पास ऊर्जा और समय तो होता है पैसा नहीं होता I बचपन में थोड़े बहुत जो सिक्के घर से या रिश्तेदारों से मिल जाया करते थे I उसको मिटटी के बने गुल्लक में जमा करते थे Iउस गुल्लक की रखवाली इस तरह से करते थे, जैसे पूरी दुनिया की नज़र उसी पे हो I क्योकि वह चंद सिक्के आज के लाखो रूपये से ज्यादा कीमती थे I



5. सर्कस - 
आज की तरह उस समय मल्टीप्लेक्स नहीं हुआ करते थे, घर से बाहर मनोरंजन के दो ही साधन थे, सर्कस और परंपरागत सिनेमाहाल I मुझे याद है वह जेमिनी सर्कसवाले जो साल में कुछ दिनों के लिए हमारे नज़दीकी शहर में आया करते थे I सर्कस में इंसानो और जानवरो का करतब देखने लायक था, उस वास्तविक करतब के आगे दूसरा कोई भी मनोरंजन का साधन फीका लगता था I लेकिन जानवरो पे प्रतिबन्ध लगने और लोगो का मल्टीप्लेक्स की तरफ झुकाव से से धीरे -धीरे सर्कस लुप्त ही हो गए I लेकिन आज भी मैं कह सकता हु कि उस सर्कस के आगे मल्टीप्लेक्स कि कोई वैल्यू नहीं है I



No comments:

Post a Comment