Wednesday, April 10, 2019

ओशो की शिक्षायें

आचार्य रजनीश उर्फ़ ओशो एक महान  दार्शनिक,चिंतक और धार्मिक नेता थे, जिन्होंने अपने विचारो से पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया और रजनीश आंदोलन का नेतृत्व किया I रजनीश एक कुशल वक्ता थे जिन्होंने बड़े साहसिक तरीके से समाज, धर्म, सरकार, अर्थव्यव्स्था, युवा, शादी, सेक्स, परिवार पर अपने विचार रखे I ओशो के विचारो और शिक्षाओं को संकलित कर किताब के रूप में प्रकाशित किया गया, जिनकी संख्या तक़रीबन 500 से ज्यादा है I आइये नज़र डालते है ओशो के कुछ प्रमुख विचारों पर I

  1. धर्म पर ओशो के विचार- ओशो किसी भी धर्म को नहीं मानते थे I ओशो का कहना था कि सभी धर्मो की उत्पत्ति हज़ारो वर्ष पहले हुई थी और उस समय के लिए यह धार्मिक विचार ठीक थे I लेकिन आज के समय में यह धार्मिक विचार अप्रासंगिक हो चुके है I आज सभी धर्म चाहे वह ईसाई हो, हिन्दू हो, मुस्लिम हो, यहूदी हो, बौद्ध हो या अन्य कोई धर्म अपने मूल सिद्धांतो से भटक चुके है I आज यह मानव की आवश्यकताओं की झूठी तृप्ति में लगे है I आज इंसान को पादरी, पुजारी, मौलवी और भिक्षुओ की नहीं, बल्कि अपने अंतरात्मा की आवाज़ को सुनना चाहिए I यह धर्म तुम्हे स्वर्ग-नरक, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म की बाते सिखाते है, जबकि वास्तविक धर्म अपने मन की, अपने अंतरात्मा की बात सुनना है I हमें एक ऐसे धर्म की जरुरत है जो आडम्बरो और मान्यताओं से मुक्त हो, जो अखंडित मानव के कल्याण की बात करता हो I
  2. सरकार पर ओशो के विचार- ओशो के अनुसार राजनीति और राजनेता समस्त मानव जाति के सबसे बड़े दुश्मन है I मानवता सत्ता के भूखे इन अहंकारी राजनेताओ के पागलपन का शिकार है, जो सत्ता और अहंकार की पूर्ति के लिए मानवता का क़त्ल कर रहे है I मानव को किसी भी सरकार की जरुरत नहीं है, मानव अपने आप में इतना कुशल और सक्षम है कि वह अपना नियमन खुद कर सकता है I ओशो एक ऐसे राज्य की कल्पना करते है, जिसकी कोई भौगौलिक सीमा ना हो और जहाँ आने और जाने की कोई पाबन्दी ना हो, एक ऐसा राज्य जो नियमो, परम्पराओ और धार्मिक मान्यताओं से मुक्त हो I 
  3. साम्यवाद पर ओशो के विचार- ओशो साम्यवाद और उनकी सामाजिक समरसता के विचारधारा के विरूद्ध थे I ओशो कार्ल के मार्क्स के साम्यवाद के विचार को आधुनिक समाज के लिए खतरनाक मानते थे I कार्ल मार्क्स का विचार कि अमीरो को लूटना और उनके धन को गरीबो में बराबर बाँटना आज के समाज के लिए विघटनकारी साबित होगी I साम्यवाद नहीं बल्कि आज पूंजीवाद के जरिये विकास और सामाजिक न्याय को सुनिश्चित किया जा सकता है I धन ही वह माध्यम है जिससे तकनीकि विकास किया जा सकता है और अगर तकनीकि विकास होगी तो गरीबी अपने आप दूर हो जाएगी I क्योकि आर्थिक विकास और तकनीकि एक दूसरे के पूरक है I पूंजीवाद आधुनिक समाज और मानवता की जरुरत है I
  4. युवाओं पर ओशो के विचार- किसी भी समाज को आगे ले जाने की जिम्मेदारी युवाओ के कंधे पे होती है I इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि युवा युवा ही बना रहे I युवाओ को भूत के बारे में नही सोचना है और अगर वह ऐसा करता है तो निश्चित रूप से मानसिक रूप से बूढ़ा हो चूका है, अगर वह भविष्य की परिकल्पना करता है तो वह मानसिक रूप से बच्चा है I हमें ऐसे युवाओ की जरूरत है जो वर्तमान में जीते हो और अपने वर्तमान को बेहतर करने के लिए प्रयासरत है I ऐसे युवा जिनकी सोच भूत और भविष्य के इर्द-गिर्द घूमती है कभी भी अपना और समाज का बेहतर नहीं कर सकते I हमें ऐसे युवा चाहिए जो जिद्दी हो, जिनमे बदलाव लाने की जिद्द हो और जिनके क्रान्तिकारी विचार हो I याद रखना है कि हम इस दुनिया में किसी की अपेक्षा पूरा करने नहीं आये I हमेशा अपने मन की सुनो और स्वंतंत्र होकर जीवन जिए I
  5. स्वामी विवेकानंद पर ओशो के विचार-  ओशो के अनुसार बिना किसी संदेह के स्वामी विवेकानंद एक बेहतरीन वक्ता, दमदार व्यक्तित्व के धनी, तेज दिमाग से परिपूर्ण करिश्माई संत थे और उनकी ज़िन्दगी निश्चित रूप से प्रेरित करने वाली है I लेकिन उनका धन के प्रति निश्क्तता हैरान करने वाली है  और ऐसा इसलिए है क्योकि उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस से उन्हें इसी तरह की शिक्षा मिली I 
  6. मौत पर ओशो के विचार- मृत्यु एक ऐसा शब्द है जिसके बारे में लोगो की अवधारणा बिलकुल गलत है I मृत्यु को जीवन का अंत मानना ही सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी है मृत्यु अंत नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की शुरुआत है I मृत्यु दो जिंदगियों  बीच का दरवाजा है, मृत्यु एक अनुभव है मृत्यु एक उत्सव है I यह मातम नहीं जश्न का विषय है, मृत्यु खूबसूरत प्रेयसी की तरह है, लेकिन अज्ञानतावश हम इसे बदसूरत मान लेते है I
  7. प्रेम पर ओशो के विचार- अक्सर ऐसा सुनने को मिल जाता है मैं स्वयं से ज्यादा तुमसे प्यार करता हु ऐसा संभव नहीं और ऐसा अगर कोई कहता है तो निश्चित रूप से वह प्रेम नहीं I दुसरो से प्रेम करने से पहले आप का स्वयं से प्रेम करना बहुत आवश्यक है I अगर आप स्वयं से प्रेम नहीं करते तो किसी से प्रेम नहीं कर सकते I स्वयं से प्रेम करने के लिए अपने को जानना बहुत आवश्यक है जिसके लिए आपको ध्यान करना पड़ेगा I अर्थात प्राथमिक चीज़ है ध्यान, फिर स्वयं से प्रेम करना और फिर किसी और से प्यार करना I
  8. सेक्स पर ओशो के विचार- सेक्स एक ऐसा विषय है जिस पर भारतीय चिंतक और दार्शनिक चुप रहे I लेकिन ओशो ने सेक्स को लेकर खुलकर अपना मत प्रकट किया I ओशो की बेस्ट सेलर किताब 'सम्भोग से समाधी तक़' इसी विषय से सम्बंधित है I ओशो के अनुसार सेक्स को समाज में गलत माना जाता है I जबकि सच यह है कि सेक्स में असीमित ऊर्जा है, इतनी ऊर्जा की जो इंसान की ज़िन्दगी परिवर्तित कर सकती है I इसलिए सेक्स की भावना को दबाना कहीं से भी न्यायोचित नहीं I सेक्स समाधि और संत की मंज़िल तक पहुंचने का सबसे सुगम रास्ता है I ओशो की इस किताब का काफी विरोध किया गया और इसके विरोध में भी कई किताबे प्रकाशित की गई I  Watch youthisthan videos on youtube

Sunday, April 7, 2019

आचार्य रजनीश उर्फ़ ओशो

आप उनके विचारो से सहमत हो सकते है या असहमत लेकिन उनके लोकप्रियता और क्षमता को नहीं नकार सकते , जी हां हम बात कर रहे है चंद्रमोहन जैन उर्फ़ आचार्य रजनीश उर्फ़ ओशो की एक दार्शनिक और चिंतक जिन्हे उनके चाहनेवाले भगवान ओशो भी बुलाते है I ओशो को एक विद्रोही चिंतक भी कहा जाता है जिनका विवादों से गहरा नाता रहा I ओशो जब भी कुछ बोलते विवाद उठना लाजमी था, क्योकि ओशो की बाते सरकार, समाज और धर्म के खिलाफ होती थी I ओशो कितने विद्रोही थे इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है, कि 21 देशो ने ओशो के प्रवेश को प्रतिबंधित कर रखा था I लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ओशो ने पूरी दुनिया से चाहनेवाले को आकर्षित किया I
जन्म- ओशो का जन्म 11 दिसंबर, 1931 को मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के कुछवाडा में एक गरीब जैन परिवार में हुआ था I ओशो के पिता का नाम बाबूलाल जैन और माता का नाम सरस्वती जैन था I ओशो का बचपन अपने नाना-नानी के घर बीता, लेकिन ओशो जब 7 वर्ष के थे तो उनके नाना की मृत्यु हो गई I नाना की मृत्यु का ओशो के ऊपर काफी बड़ा प्रभाव पड़ा और इसके बाद ओशो अपने घर माता-पिता के पास आ गए I ओशो बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थ, जिसके अंदर सत्य को जानने की लालसा थी, लेकिन इसके साथ-साथ ओशो विद्रोही स्वभाव के भी थे I
शिक्षा- प्रारंभिक शिक्षा अपने ननिहाल और गांव से पूरा करने के बाद रजनीश उच्च शिक्षा के लिए जबलपुर चले गए I जबलपुर के हितकारिणी कॉलेज, डी. एन. कॉलेज और सागर विश्विद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातक और परास्नातक की डिग्री ली I छात्र जीवन के दौरान दो राष्ट्रवादी संगठनो आज़ाद हिन्द फौज (Indian National Army) और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (Rastriya Swain Sewak Sangh) से जुड़े रहे I
ओशो एक वक्ता के रूप में- उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद ओशो ने जबलपुर के एक कॉलेज में दर्शनशास्त्र के प्रवक्ता के रूप में पढ़ाना शुरू किया I ओशो एक अच्छे वक्ता थे और इस कारण काफी कम समय में छात्रों के बीच लोकप्रिय हो गए I लेकिन उनकी शिक्षाए धर्म, सरकार , समाज के खिलाफ होने के कारण विवाद हो गया, जिसकी वजह से ओशो को कॉलेज से निकाल दिया गया I फिर ओशो ने जबलपुर विश्वविद्यालय में पढ़ाना शुरू किया, लेकिन वहां भी अपने विद्रोही व्याख्यानों के कारण ओशो को नौकरी से हटा दिया गया I यह 1955 के आसपास का दौर था और उस समय तक ओशो छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय हो चुके थे I अब ओशो ने पुरे भारत में घूमकर-घूमकर व्याख्यान देना शुरू किया और अपने को आचार्य रजनीश कहने लगे I रजनीश अब पुरे भारत में लोकप्रिय हो चुके थे लेकिन लोकप्रियता के साथ-साथ रजनीश के खिलाफ विद्रोह भी बढ़ता गया I रजनीश खुलकर गाँधी, सरकार, वामपंथ, धर्म और सामाजिक रूढ़िताओ के खिलाफ बोल रहे थे, जिसके कारण आचार्य रजनीश के खिलाफ कार्यवाही करने की मांग उठने लगी I
ओशो सेक्स गुरु के रूप में - सेक्स एक ऐसा विषय है जिसके बारे में भारतीय दार्शनिक चुप रहते है I लेकिन ओशो ने सेक्स के बारे में न सिर्फ बोला बल्कि सेक्स को महत्वपूर्ण बताया I रजनीश के अनुसार सेक्स प्रेम का सार है और समाधि की अवस्था में जाने की प्राथमिक सीढ़ी I 1960 के दशक में रजनीश के सेक्स से सम्बंधित विचारो को संकलित कर किताब के रूप में प्रकाशित किया गया I जिसका नाम 'सम्भोग से समाधि तक़ (Sex to superconsciousness)'  रखा गया I यह किताब इंटरनेशनल बेस्ट सेलर थी जिसका 60 से ज्यादा भाषाओ में अनुवाद किया गया I इस किताब के प्रकाशन के बाद रजनीश को 'सेक्स गुरु' कहा गया I इस किताब के बाद एक तरफ जहा भारत सहित पश्चिमी देशो में रजनीश के चाहंने वालो की संख्या तेजी से बढ़ने लगी वही दूसरी तरफ रजनीश के खिलाफ विद्रोह भी बढ़ता गया I
ओशो मैडिटेशन रिसोर्ट- 1970 के दशक तक रजनीश भारत सहित पश्चिमी देशो में लोकप्रिय हो चुके थे I यही वह दौर था जब रजनीश ने पुणे में काफी बड़े एरिया में ओशो मैडिटेशन रिसोर्ट की स्थापना की और अपने को भगवान ओशो कहने लगे I यह मैडिटेशन रिसोर्ट ओशो के अनुवाईयो का मुख्य केंद्र बन गया I देश-विदेश से लाखो लोग इस मैडिटेशन रिसोर्ट में आने लगे, जिनमे ज्यादातर पश्चिमी देशो के युवक-युवतिया थी I इस रिसोर्ट में लोगो को हर काम की पूरी आज़ादी थी, कोई भी रोक -टोक नहीं था I ओशो के आलोचक इसे सेक्स मंडी भी कहने लगे I
ओशो का पश्चिम भ्रमण- 1981 में ओशो बीमार पड़ गए और उनके चाहने वालो ने अमेरिका जाकर इलाज करने की जिद्द की I ओशो 1981 में अमेरिका इलाज कराने गए और कुछ ही दिनों में ओशो स्वस्थ हो गए I उस समय अमेरिका में ओशो के चाहने वालो की तादाद लाखो में थी, जिनमे ज्यादातर अमीर थे I अमेरिका में उनके चाहने वालो ने ओशो से वही बसने की अपील की I इसके लिए बाकायदा अमेरिका के ओरेगाओ में 70 एकड़ भूमि खरीदी गई और रजनीशपुरम नाम का शहर बसाया गया I धीरे-धीरे यहाँ लाखो की तादाद में घर बन गए और यह सभी ओशो के अनुयायी थे I सिर्फ चार सालो में रजनीशपुरम को एक अच्छे शहर की तरह सुसज्जित कर दिया गया I यहाँ रजनीश एयरपोर्ट बनाया गया, ओशो के द्वारा कानून बनाये गए, और सामानांतर सरकार का गठन किया गया I अब यह अमेरिका सरकार के लिए सीधी चुनौती थी I ओशो के सरकार और धर्म के खिलाफ शिक्षाओं के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और करीब 6 महीने बाद इस शर्त पे रिहा किया गया कि ओशो अमेरिका हमेशा के लिए छोड़ देंगे I 1985 में ओशो ने अमेरिका छोड़ दिया और अन्य पश्चिमी देशो का रुख किया I लेकिन चर्च के दबाव में सभी पश्चिमी देशो ने ओशो का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया I अमेरिका के पडोसी देश उरुग्वे ने कुछ दिन तक ओशो को शरण दिया, लेकिन अमेरिका के दबाव में उसने भी ओशो पे प्रतिबन्ध लगा दिया I अब ओशो के पास भारत वापिस आने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था I ओशो भारत वापिस आकर ओशो मैडिटेशन रिसोर्ट में उपदेश देने लगे I
 मृत्यु- 19 जनवरी, 1990 को पुणे के ओशो मैडिटेशन रिसोर्ट में ओशो का निधन हो गया I ओशो का निधन भी बड़े रहस्यमय परिस्थितियो में हुआ I कुछ लोग कहते है की ओशो ने खुद देह त्याग किया,  कुछ लोगो का मानना है कि ओशो को अमेरिका में कैद के दौरान 'हीलियम' नाम का ज़हर (slow poison) दिया गया, जबकि ओशो के परिवार के सदस्यों ने कुछ लोगो पर प्रॉपर्टी के लिए हत्या करने का आरोप लगाया I क्योकि ओशो के पास देश-विदेश में अरबो की प्रॉपर्टी थी I लेकिन जो भी कारण रहा हो ओशो के चाहने वाले ओशो के मृत्यु को ही नकारते है, उनका मानना है कि ओशो भगवान थे और ओशो ने न तो कभी जन्म लिया और नहीं मरे ओशो तो सिर्फ कुछ सालो के लिए इस धरती पर आये थे I
ओशो के बारे में अनसुने तथ्य- 
  1. ओशो शब्द लैटिन भाषा के 'ओशनिक' से लिया गया है जिसका मतलब है सागर में विलीन हो जाना I
  2. ओशो के द्वारा दिए गए उपदेशो को किताबो में संकलित कर प्रकाशित किया गया और ऐसे किताबो की संख्या 500 से ज्यादा है, जिनका सभी प्रमुख भाषाओ में अनुवाद किया गया है I
  3. ओशो की किताबो से आज भी अरबो रूपये की रॉयल्टी आती है I
  4. ओशो द्वारा लिखित 'सम्भोग से समाधि तक़ (Sex to superconsciousness)' इंटरनेशनल बेस्ट सेलर है, यह किताब 60 से ज्यादा भाषाओ में उपलब्ध है I
  5. ओशो द्वारा स्थापित ओशो मैडिटेशन रिसोर्ट, पुणे विदेशियों का प्रमुख आकर्षण केंद्र है I
  6. ओशो ने धर्मरहित और सामाजिक मान्यताओं से मुक्त समाज की बात कही , जिसमे प्रत्येक व्यक्ति के पास अपने तरीके से ज़िन्दगी जीने की आज़ादी हो I
  7. ओशो ने एक वैश्विक राज्य की बात की I
  8. ओशो दुनिया के इतिहास में शायद पहले ऐसे दार्शनिक थे, जिनके प्रवेश को 21 देशो(अमेरिका, स्वीडन, इंग्लैंड, रूस, जर्मनी, फ्रांस, ग्रीस, उरुग्वे, कनाडा सहित ) ने प्रतिबंधित कर रखा था I  
  9. ओशो अपने को भगवान मानते थे I उनके अनुसार 23 वर्ष की उम्र में जबलपुर में एक पार्क में एक पेड़ के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था I
  10. फ़िल्मी दुनिया के कई सितारें और राजनेता ओशो के अनुयायी थे, जिनमे प्रमुख विनोद खन्ना, महेश भट्ट और परवीन बॉबी शामिल है I विनोद खन्ना ने तो अपने स्टारडम को छोड़ कर अमेरिका के रजनीशपुरम जाकर ओशो के आश्रम में पांच साल बिताये I
  11. ओशो मौत को एक उत्सव मानते थे और यही कारण है कि उनके पुणे स्थित पुणे योग केंद्र में किसी की भी मौत पर मातम की जगह ऊत्सव मनाया जाता था I ओशो के मौत पर भी उनकी इच्छानुसार जश्न मनाया गया I



Saturday, April 6, 2019

सुख क्या है ?

सुख क्या है ? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब मैं बचपन से ढूंढ रहा I लेकिन अब तक इसका सही जवाब नहीं मिला I इस प्रश्न के जवाब की उत्सुकता इसलिए भी हुई, क्योकि मैं बचपन से देख रहा हर इंसान सिर्फ ख़ुशी की ही कामना करता है I लेकिन अब तक कोई ऐसा इंसान नहीं मिला, जो पूरी तरह से प्रसन्न हो और जिसके जीवन में दुःख न हो I अपने स्कूल के दिनों में मैंने एक कहानी पढ़ी थी, जिसके बाद काफी हद तक मुझे समझ में आ गया, ख़ुशी क्या है ?
                        यह कहानी एक बड़े राज्य के राजा की थी जो मदिरा और सुंदरियों में खोया  रहता था, राजा स्वस्थ  सुंदर था, खाने - पीने और अन्य सुख सुविधा की कोई कमी ना थी I कहने की बात यह है कि उस राजा के पास वह सब कुछ था जो एक विलासी जीवन जीने के लिए चाहिए होता है I एक दिन की बात है राजा को अचानक से लगा कि लोग अक्सर बीमार पड़ते रहते है, लेकिन वह आज तक कभी बीमार नहीं पड़ा I इसका मतलब मुझे गंभीर बीमारी है,  जिसकी वज़ह से मैं बीमार नहीं पड़ता I अब राजा के दिमाग में यह बात बैठ गई कि उसे कोई बीमारी ना होना, इस बात का संकेत है कि वह गंभीर बीमारी से पीड़ित है I इस बात को लेके राजा उदास और दुखी रहने लगा I राजा ने अपने सेनापति को बुलाया और आदेश दिया कि राजा के इलाज के लिए इस राज्य के सबसे अच्छे डॉक्टरो को बुलाया जाये I जो भी डॉक्टर राजा का इलाज कर देगा उसे काफी बड़ा इनाम दिया जायेगा, लेकिन अगर कोई डॉक्टर बीमारी की पहचान कर इलाज नहीं कर पाया तो उसका सिर कलम कर दिया जायेगा I राजा के आदेशानुसार राज्य के अच्छे डॉक्टरों को एक-एक कर बुलाया गया और सबका कहना था कि राजा पूरी तरह से स्वस्थ है और उसे कोई बीमारी नहीं है I लेकिन राजा तो बीमारी के बारे में सुनना चाहता था और इसलिए उसने डॉक्टरों का सिर कलम करने का आदेश दिया I इस तरीके से एक-एक कर राज्य के सभी डॉक्टरों को बुलाया गया और सबका सिर कलम कर दिया गया I क्योकि सबका एक ही जवाब था राजा बीमार नहीं है I
                             अंत में पुरे राज्य में सिर्फ दो युवा डॉक्टर रह गए, जिन्होंने अभी- अभी कॉलेज की पढाई ख़तम की थी I दोनों ही कॉलेज में साथ- साथ पढ़े थे और हॉस्टल में भी साथ ही रहते थे I दोनों ही डॉक्टर पढ़ने में काफी अव्वल थे, लेकिन दोनों वैचारिक रूप से एक दूसरे से भिन्न थे I पहला डॉक्टर जो काफी मोटा था किताबी ज्ञान को व्याव्हारिक ज्ञान से ज्यादा प्राथमिकता देता था, उसका मानना था एक अच्छा डॉक्टर बनने के लिए किताबी ज्ञान का होना जरुरी है नाकि व्याव्हारिक ज्ञान का I जबकि दूसरा डॉक्टर जो काफी दुबला-पतला था हमेशा व्यावहारिक ज्ञान को प्राथमिकता देता था I राजा के इलाज के लिए इन दोनों डॉक्टरों को बुलाया गया I सबसे पहले मोटे डॉक्टर जो किताबी ज्ञान में विश्वास रखता था, को बुलाया गया I डॉक्टर ने राजा का चेक-अप किया, किताबी ज्ञान के हिसाब से राजा को कोई बीमारी नहीं थी I इसलिए डॉक्टर ने बोला राजा बीमार नहीं है, यह सुनते ही राजा आग बबूला हो गया और उसके आदेश पर डॉक्टर का सिर कलम कर दिया गया I अब दूसरे डॉक्टर को बुलाया गया दूसरे डॉक्टर को समझ में आ गया कि राजा बेवकूफ और मानसिक रूप से बीमार है, सच बोलना मतलब अपना सिर कलम कराना है I डॉक्टर ने राजा का चेक-अप किया और बोला राजा गंभीर रूप से बीमार है I राजा यह सुन काफी खुश हुआ क्योकि वह यही सुनना चाहता था राजा ने डॉक्टर को काफी सोने- चांदी दिए I
                           अब राजा ने बीमारी के इलाज के लिए पूछा , डॉक्टर ने कहा कि इलाज काफी आसान है बस एक दिन के लिए किसी सुखी इंसान का कमीज़ आप पहन ले बीमारी बिलकुल ठीक हो जाएगी I राजा ने अपने सैनिको को किसी सुखी इंसान का कमीज़ एक दिन के लिए लाने का आदेश दिया I सैनिको को भी लगा यह तो बड़ा आसान काम है, अब सैनिक निकल पड़े राज्य के भ्रमण के लिए ताकि कोई सुखी इंसान मिल जाये I सबसे पहले सैनिक सेठ- साहूकारों के पास पहुंचे और उनसे पूछा कि आप सुखी है लेकिन सबने कहा कि वह सुखी नहीं है I इस तरह सैनिको ने पूरा राज्य भ्रमण कर लिया लेकिन कोई सुखी इंसान नहीं मिला I अन्तत सैनिक निराश होकर वापिस लौट रहे थे, तभी उनकी नज़र एक बूढ़े किसान पर पड़ी जो जून की तेज दोपहर में खेत में हल चला रहा था  I एक सैनिक ने कहा कि इस पुरे राज्य में यह किसान ही एकमात्र बच गया है जिससे हमने पूछा नहीं I लेकिन बाकि सैनिको ने कहा कि इस राज्य के सेठ-साहूकार सुखी नहीं है तो यह बूढ़ा किसान कैसे सुखी हो सकता है I फिर भी सैनिको ने सोचा पूछने में क्या जाता है सैनिक किसान के पास गए और पूछा क्या तुम सुखी हो I किसान ने हँसते हुए जवाब दिया हां मैं बिलकुल सुखी ह,  मैं एक-एक कर अपने परिवार के सभी सदस्यों को भूख और बीमारी से खो चूका हु, इसलिए अब मेरे पास दुखी होने का कोई कारण नहीं है I सैनिको के ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा, सैनिको ने बूढ़े किसान से कहा तुम अपना कमीज़ एक दिन के लिए दे दो राजा के इलाज के लिए I इसके बदले तुम्हे ढेर सारा धन मिलेगा, किसान ने कहा कि मुझे अब धन-दौलत की जरुरत नहीं, लेकिन हां मैं राजा के लिए अपना कमीज़ दे देता, अगर मेरे पास होता I सैनिको ने वापिस आकर राजा को यह बात बताई I राजा को सारा मामला समझ में आ गया और अपनी बीमारी का इलाज भी मिल गया राजा ने डॉक्टर को काफी धन-दौलत के साथ विदा किया I
कहानी की सीख -
  1. सुखी होने के लिए धन-धान्य और भौतिक साधनो की जरुरत नहीं होती I
  2. सुख अपने अंदर ही निहित है इसे पाने के लिए कही और जाने की जरुरत नहीं I
  3. कॉलेज की परीक्षा को किताबी ज्ञान से पास किया जा सकता है, लेकिन ज़िन्दगी की परीक्षा के लिए व्यवहारिक ज्ञान की जरुरत होती है I
  4. मुर्ख और रूढ़िवादी इंसान वही सुनना चाहता है जिसकी धारणा उसने पहले से बना रखी है I ऐसे इंसान के सामने ज्ञान का प्रदर्शन और तर्क-वितर्क करना बेवकूफी है I

                           

Wednesday, April 3, 2019

लाल बहादुर शास्त्री - भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष

लाल  बहादुर शास्त्री एक ऐसा नाम जिसे सुनकर हर एक भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है I एक ऐसा राजनेता जिसने ईमानदारी, सादगी, त्याग और बहादुरी की ऐसी मिसाल पेश की जिसका कोई जवाब नहीं I एक  गरीब परिवार से प्रधानमंत्री बनने तक का सफर इतना आसान नहीं था, लेकिन संघर्ष करते हुए उस मुकाम तक पहुंचे I भारतीय राजनीति में ऐसा नेता ना तो कभी हुआ और नहीं होगा I
जन्म- भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को दीनदयाल उपाध्याय नगर , उत्तर प्रदेश में एक कायस्थ परिवार में हुआ था I लाल बहादुर शास्त्री का वास्तविक नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था, लेकिन काशी विद्यापीठ से शास्त्री की डिग्री लेने के बाद उनका नाम लाल बहादुर शास्त्री पड़ गया I लाल बहादुर शास्त्री के पिता का नाम शारदा प्रसाद श्रीवास्तव और माता का नाम रामदुलारी देवी था I लाल बहादुर शास्त्री के पिता स्कूल अध्यापक थे और माता गृहणी थी I दो भाई- बहनो में शास्त्री जी दूसरे नंबर के थे I जब लाल बहादुर शास्त्री सिर्फ एक साल के थे, उनके पिता की मृत्यु हो गई I शास्त्री जी का बचपन उनके नाना के घर बीता I शास्त्री जी का बचपन काफी अभावो और संघर्षो में बीता, और यही कारण है लाल बहादुर शास्त्री वक़्त के साथ मज़बूत होते गए I शास्त्री जी की प्रारंभिक शिक्षा दीनदयाल उपाध्याय नगर से ही हुई और उच्च शिक्षा काशी विद्यापीठ, वाराणसी से हुई I काशी विद्यापीठ, वाराणसी से लाल बहादुर शास्त्री ने 'शास्त्री' की उपाधि ली I लाल बहादुर शास्त्री पढाई करने के लिए प्रतिदिन गंगा नदी पार कर स्कूल जाया करते थे I लाल बहादुर शास्त्री का विवाह ललिता श्रीवास्तव से हुई थी
स्वाधीनता संग्राम में योगदान - लाल बहादुर शास्त्री महान दार्शनिक और चिंतक स्वामी विवेकानंद और महान चिंतक मदन मोहन मालवीय के विचारो से काफी प्रभावित थे I 1928 में शास्त्री जी कांग्रेस के सक्रिय सदस्य बने और  अलग- अलग पदों पर कांग्रेस में बने रहे I लाल बहादुर शास्त्री ने सत्याग्रह आंदोलन, भारत छोडो आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और स्वंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया I स्वंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण अंग्रेजी सरकार ने उन्हें जेल में डाल दिया और कुल मिलकर लाल बहादुर शास्त्री तक़रीबन 10 साल जेल में रहे I जेल में रहने के दौरान लाल बहादुर शास्त्री ने रुसी क्रांति, फ्रांस की क्रांति, और यूरोप की क्रांति के बारे में  पढ़ा और आत्मसात किया I
राजनीतिक करियर- 15 अगस्त, 1947 को आज़ादी के बाद उत्तर प्रदेश राज्य में गोविन्द वल्लभ पंत के नेतृत्व में बनी सरकार में लाल बहादुर शास्त्री सड़क और परिवहन मंत्री बने I इसके अलावा राज्य के पुलिस मंत्री (गृह मंत्री) के रूप में भी अपनी सेवाएं दी I 1952 में लाल बहादुर शास्त्री को भारत का रेल मंत्री बनाया गया और वह 1956 तक इस पद पर बने रहे I 1964 में जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद शास्त्री जी भारत के प्रधानमंत्री बने और मृत्युपर्यन्त इस पद पर बने रहे I
भारत-पाकिस्तान युद्ध- अगस्त 1965 को पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख अयूब खान के नेतृत्व में पाकिस्तानी सेना ने भारत पे आक्रमण कर दिया लेकिन शास्त्री जी ने आक्रमण का मुंहतोड़ जवाब दिया आक्रमण के कुछ ही दिनों के अंदर भारतीय सेना ने पाकिस्तान के लाहौर तक कब्ज़ा कर लिया अब पाकिस्तान को समझ में आ गया कि अगर यह युद्ध रुका नहीं तो कुछ ही दिनों में भारतीय सेना कराची और इस्लामाबाद भी कब्ज़ा कर लेगी अयूब खान ने अमेरिका से युद्ध रुकवाने की अपील की अमेरिका ने लाल बहादुर शास्त्री से युद्ध रोकने की अपील की लेकिन शास्त्री जी ने सिरे से ख़ारिज कर दिया इसके बाद फिर अमेरिका ने शास्त्री जी को धमकी दी कि अगर युद्ध नहीं रुका तो भारत को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे लेकिन मज़बूत व्यक्तित्व के नेता शास्त्री जी ने अमेरिका की धमकी को अनसुना कर दिया लेकिन कुछ भारतीय नेताओ के धरना- प्रदर्शन कारण शास्त्री जी ने युद्ध रोकने का निर्णय लिया
मृत्यु- 10 जनवरी, 1966 को ताशकंद में रूस की मध्यस्थता से लाल बहादुर शास्त्री और अयूब खान के बीच समझौता हुआ और भारत ने पाकिस्तान का जीता हुआ क्षेत्र वापिस कर दिया I समझौता के बाद अचानक लाल बहादुर शास्त्री की तबियत बिगड़ने लगी और उनकी मृत्यु हो गई I भारत सरकार ने मृत्यु का कारण हृदय गति का रुकना बताया जबकि बाद में पता चला कि उन्हें ज़हर दिया गया है I यहाँ तक कि भारत सरकार ने उनकी लाश का पोस्ट मोर्टेम भी नहीं कराया और नहीं कोई जाँच कराइ गई I शास्त्री जी को किस षड़यंत्र के तहत ज़हर दिया गया यह आज भी रहस्य बरक़रार है I
लाल बहादुर शास्त्री के बारे में अनसुने तथ्य-

  1. लाल बहादुर शास्त्री को 1966 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया I
  2. भारत से युद्ध में बुरी तरह पराजय के बाद पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह अयूब खान ने  साक्षात्कार के दौरान बताया कि मुझे शास्त्री जी के सादगी से लगा कि वह एक कमजोर नेता है और यही गलती पाकिस्तान की सबसे बड़ी भूल थी I शास्त्री जी ने जिस तरह से भारतीय सेना का नेतृत्व किया अकल्पनीय था I
  3. उत्तर प्रदेश के सड़क और परिवहन मंत्री रहते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने महिलाओ के बस कंडक्टर बनने का रास्ता साफ किया I
  4. उत्तर प्रदेश के पुलिस मंत्री रहते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने सबसे पहले लाठी चार्ज की जगह वाटर फाॅर्स प्रयोग करने की शुरुआत की I
  5. लाल बहादुर शास्त्री के लिए लोगो की निष्ठां का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अन्न की कमी होने पर शास्त्री जी ने सप्ताह में एक दिन व्रत रखने का आह्वान किया I जिसे पुरे भारत ने स्वीकार किया जिसे 'शास्त्री व्रत ' के नाम से जाना है I
  6. युद्ध के दौरान अमेरिका ने गेंहू का आयात रोक दिया और शास्त्री जी ने सप्ताह में एक दिन व्रत रखने का आह्वान किया और खर्चो की कटौती करने का आह्वान किया खुद शास्त्री जी ने अपने सारे खर्चो में कटौती की I
  7. लाल बहादुर शास्त्री ने एक रेल दुर्घटना के बाद पूरी जिम्मेदारी लेते हुए रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था I ऐसा उदहारण भारतीय राजनीति में कम ही देखने को मिलती है I
  8. लाल बहादुर शास्त्री आज़ादी के आंदोलन के दौरान जब जेल में थे तब उनकी बेटी बीमार हो गई थी I लेकिन अँगरेज़ सरकार ने पैरोल पर रिहा करने के लिए कुछ शर्त रखी जो शास्त्री जी को मंज़ूर नहीं थी और अन्तत लाल बहादुर शास्त्री की बेटी का देहांत हो गया I 
  9. लाल बहादुर शास्त्री जब प्रधानमंत्री थे तो उनके पास सिर्फ दो जोड़ी कपड़े थे I
  10. लाल बहादुर शास्त्री ने कोई भी सरकारी सुविधा नहीं ले रखी थी, वह अपना सारा काम खुद ही करते थे I 
  11. लाल बहादुर शास्त्री ने भारतीय राजनीति में सादगी, ईमानदारी और साहस की जो मिसाल पेश की शायद ही ऐसा कोई दूसरा उदहारण मिले I
  12. भारत- पाक युद्ध के समय शास्त्री जी ने 'जय जवान जय किसान' का नारा दिया इस नारे ने भारतीय जवानो के लिए संजीवनी का काम किया I