Wednesday, April 10, 2019

ओशो की शिक्षायें

आचार्य रजनीश उर्फ़ ओशो एक महान  दार्शनिक,चिंतक और धार्मिक नेता थे, जिन्होंने अपने विचारो से पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया और रजनीश आंदोलन का नेतृत्व किया I रजनीश एक कुशल वक्ता थे जिन्होंने बड़े साहसिक तरीके से समाज, धर्म, सरकार, अर्थव्यव्स्था, युवा, शादी, सेक्स, परिवार पर अपने विचार रखे I ओशो के विचारो और शिक्षाओं को संकलित कर किताब के रूप में प्रकाशित किया गया, जिनकी संख्या तक़रीबन 500 से ज्यादा है I आइये नज़र डालते है ओशो के कुछ प्रमुख विचारों पर I

  1. धर्म पर ओशो के विचार- ओशो किसी भी धर्म को नहीं मानते थे I ओशो का कहना था कि सभी धर्मो की उत्पत्ति हज़ारो वर्ष पहले हुई थी और उस समय के लिए यह धार्मिक विचार ठीक थे I लेकिन आज के समय में यह धार्मिक विचार अप्रासंगिक हो चुके है I आज सभी धर्म चाहे वह ईसाई हो, हिन्दू हो, मुस्लिम हो, यहूदी हो, बौद्ध हो या अन्य कोई धर्म अपने मूल सिद्धांतो से भटक चुके है I आज यह मानव की आवश्यकताओं की झूठी तृप्ति में लगे है I आज इंसान को पादरी, पुजारी, मौलवी और भिक्षुओ की नहीं, बल्कि अपने अंतरात्मा की आवाज़ को सुनना चाहिए I यह धर्म तुम्हे स्वर्ग-नरक, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म की बाते सिखाते है, जबकि वास्तविक धर्म अपने मन की, अपने अंतरात्मा की बात सुनना है I हमें एक ऐसे धर्म की जरुरत है जो आडम्बरो और मान्यताओं से मुक्त हो, जो अखंडित मानव के कल्याण की बात करता हो I
  2. सरकार पर ओशो के विचार- ओशो के अनुसार राजनीति और राजनेता समस्त मानव जाति के सबसे बड़े दुश्मन है I मानवता सत्ता के भूखे इन अहंकारी राजनेताओ के पागलपन का शिकार है, जो सत्ता और अहंकार की पूर्ति के लिए मानवता का क़त्ल कर रहे है I मानव को किसी भी सरकार की जरुरत नहीं है, मानव अपने आप में इतना कुशल और सक्षम है कि वह अपना नियमन खुद कर सकता है I ओशो एक ऐसे राज्य की कल्पना करते है, जिसकी कोई भौगौलिक सीमा ना हो और जहाँ आने और जाने की कोई पाबन्दी ना हो, एक ऐसा राज्य जो नियमो, परम्पराओ और धार्मिक मान्यताओं से मुक्त हो I 
  3. साम्यवाद पर ओशो के विचार- ओशो साम्यवाद और उनकी सामाजिक समरसता के विचारधारा के विरूद्ध थे I ओशो कार्ल के मार्क्स के साम्यवाद के विचार को आधुनिक समाज के लिए खतरनाक मानते थे I कार्ल मार्क्स का विचार कि अमीरो को लूटना और उनके धन को गरीबो में बराबर बाँटना आज के समाज के लिए विघटनकारी साबित होगी I साम्यवाद नहीं बल्कि आज पूंजीवाद के जरिये विकास और सामाजिक न्याय को सुनिश्चित किया जा सकता है I धन ही वह माध्यम है जिससे तकनीकि विकास किया जा सकता है और अगर तकनीकि विकास होगी तो गरीबी अपने आप दूर हो जाएगी I क्योकि आर्थिक विकास और तकनीकि एक दूसरे के पूरक है I पूंजीवाद आधुनिक समाज और मानवता की जरुरत है I
  4. युवाओं पर ओशो के विचार- किसी भी समाज को आगे ले जाने की जिम्मेदारी युवाओ के कंधे पे होती है I इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि युवा युवा ही बना रहे I युवाओ को भूत के बारे में नही सोचना है और अगर वह ऐसा करता है तो निश्चित रूप से मानसिक रूप से बूढ़ा हो चूका है, अगर वह भविष्य की परिकल्पना करता है तो वह मानसिक रूप से बच्चा है I हमें ऐसे युवाओ की जरूरत है जो वर्तमान में जीते हो और अपने वर्तमान को बेहतर करने के लिए प्रयासरत है I ऐसे युवा जिनकी सोच भूत और भविष्य के इर्द-गिर्द घूमती है कभी भी अपना और समाज का बेहतर नहीं कर सकते I हमें ऐसे युवा चाहिए जो जिद्दी हो, जिनमे बदलाव लाने की जिद्द हो और जिनके क्रान्तिकारी विचार हो I याद रखना है कि हम इस दुनिया में किसी की अपेक्षा पूरा करने नहीं आये I हमेशा अपने मन की सुनो और स्वंतंत्र होकर जीवन जिए I
  5. स्वामी विवेकानंद पर ओशो के विचार-  ओशो के अनुसार बिना किसी संदेह के स्वामी विवेकानंद एक बेहतरीन वक्ता, दमदार व्यक्तित्व के धनी, तेज दिमाग से परिपूर्ण करिश्माई संत थे और उनकी ज़िन्दगी निश्चित रूप से प्रेरित करने वाली है I लेकिन उनका धन के प्रति निश्क्तता हैरान करने वाली है  और ऐसा इसलिए है क्योकि उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस से उन्हें इसी तरह की शिक्षा मिली I 
  6. मौत पर ओशो के विचार- मृत्यु एक ऐसा शब्द है जिसके बारे में लोगो की अवधारणा बिलकुल गलत है I मृत्यु को जीवन का अंत मानना ही सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी है मृत्यु अंत नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की शुरुआत है I मृत्यु दो जिंदगियों  बीच का दरवाजा है, मृत्यु एक अनुभव है मृत्यु एक उत्सव है I यह मातम नहीं जश्न का विषय है, मृत्यु खूबसूरत प्रेयसी की तरह है, लेकिन अज्ञानतावश हम इसे बदसूरत मान लेते है I
  7. प्रेम पर ओशो के विचार- अक्सर ऐसा सुनने को मिल जाता है मैं स्वयं से ज्यादा तुमसे प्यार करता हु ऐसा संभव नहीं और ऐसा अगर कोई कहता है तो निश्चित रूप से वह प्रेम नहीं I दुसरो से प्रेम करने से पहले आप का स्वयं से प्रेम करना बहुत आवश्यक है I अगर आप स्वयं से प्रेम नहीं करते तो किसी से प्रेम नहीं कर सकते I स्वयं से प्रेम करने के लिए अपने को जानना बहुत आवश्यक है जिसके लिए आपको ध्यान करना पड़ेगा I अर्थात प्राथमिक चीज़ है ध्यान, फिर स्वयं से प्रेम करना और फिर किसी और से प्यार करना I
  8. सेक्स पर ओशो के विचार- सेक्स एक ऐसा विषय है जिस पर भारतीय चिंतक और दार्शनिक चुप रहे I लेकिन ओशो ने सेक्स को लेकर खुलकर अपना मत प्रकट किया I ओशो की बेस्ट सेलर किताब 'सम्भोग से समाधी तक़' इसी विषय से सम्बंधित है I ओशो के अनुसार सेक्स को समाज में गलत माना जाता है I जबकि सच यह है कि सेक्स में असीमित ऊर्जा है, इतनी ऊर्जा की जो इंसान की ज़िन्दगी परिवर्तित कर सकती है I इसलिए सेक्स की भावना को दबाना कहीं से भी न्यायोचित नहीं I सेक्स समाधि और संत की मंज़िल तक पहुंचने का सबसे सुगम रास्ता है I ओशो की इस किताब का काफी विरोध किया गया और इसके विरोध में भी कई किताबे प्रकाशित की गई I  Watch youthisthan videos on youtube

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